उच्चतम न्यायालय में एक याचिका डाली गई है जिसमें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा हाल ही में जारी किए गए नए नियमों को चुनौती दी गई है।
नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय में एक याचिका डाली गई है जिसमें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा हाल ही में जारी किए गए नए नियमों को चुनौती दी गई है। याचिका में आरोप है कि UGC द्वारा जारी नए नियमों में जाति आधारित भेदभाव की गैर-समावेशी परिभाषा अपनाई गई है और संस्थागत सुरक्षा से कुछ श्रेणियों को बाहर कर दिया गया है।
आरक्षित वर्ग के बाहर सुरक्षा न मिलने पर सवाल
याचिकाकर्ता विनीत जिंदल का आरोप है कि ये नियम 'भेदभाव' की परिभाषा को बहुत सीमित दायरे में देखते हैं। उनके अनुसार, नियमों में जाति आधारित भेदभाव को केवल एससी, एसटी और ओबीसी तक ही सीमित रखा गया है, जिससे उन छात्रों और शिक्षकों की सुरक्षा को नजरअंदाज कर दिया गया है जो इन आरक्षित श्रेणियों में नहीं आते। इसमें कहा गया है कि यह नियम अनुच्छेद 14 (बराबरी का अधिकार) और 15(1) (धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर राज्य द्वारा भेदभाव पर रोक) के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
संवैधानिक अधिकारों के हनन का आरोप
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि यह विनियम संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार, जिसमें सम्मान के साथ जीने का अधिकार शामिल है) का उल्लंघन करता है। इसमें शीर्ष अदालत से अनुरोध किया गया है कि अधिकारियों को नियम 3(सी) को उसके मौजूदा स्वरूप में लागू करने से रोका जाए और जाति-आधारित भेदभाव को ‘जाति-तटस्थ और संविधान अनुरूप’ तरीके से फिर से परिभाषित किया जाए।
'जाति-तटस्थ' परिभाषा और समान मदद की मांग
इसमें कहा गया है, “जाति के आधार पर भेदभाव को इस तरह से परिभाषित किया जाना चाहिए कि जाति के आधार पर भेदभाव का शिकार होने वाले सभी लोगों को सुरक्षा मिले, चाहे उनकी जाति की पहचान कुछ भी हो।” याचिका में केंद्र सरकार और यूजीसी को अंतरिम निर्देश देने की मांग की गई है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इन नियमों के तहत बनाए गए ‘समान अवसर केंद्र’ और ‘समानता हेल्पलाइन’ आदि को बिना किसी भेदभाव के उपलब्ध कराया जाए।
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