पश्चिम एशिया की जंग और होर्मुज जलडमरूमध्य में अमेरिका व ईरान की नाकेबंदी की वजह से वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल के साथ ही उर्वरकों की आपूर्ति भी प्रभावित हुई है।
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया की जंग और होर्मुज जलडमरूमध्य में अमेरिका व ईरान की नाकेबंदी की वजह से वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल के साथ ही उर्वरकों की आपूर्ति भी प्रभावित हुई है। उर्वरकों की कमी के कारण कई देशों में कृषि कार्य प्रभावित हुआ है। भारत भी इससे अछूता नहीं है।
उर्वरक संकट पर वैश्विक चिंता
होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी की वजह से हो रही उर्वरकों की कमी को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी चिंता जाहिर की है। संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि उर्वरकों की कमी ऐसे ही बनी रही तो कई देशों में एक बड़ी आबादी भुखमरी की चपेट में आ सकती है। इन चिंताओं को देखते हुए भारत ने रूस के साथ मिलकर वैकल्पिक उपायों पर काम शुरू कर दिया है।
रूस के समारा में लगेगा प्लांट
भारत ने भविष्य में उर्वरकों की जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस के साथ संयुक्त उद्यम में फर्टिलाइजर प्लांट लगाने की प्रक्रिया तेज कर दी है। यह प्लांट रूस के समारा में लगाया जा रहा है, जो अगले दो साल में बनकर तैयार हो जाएगा। इस परियोजना के शुरू होने के बाद भारत की मिडिल-ईस्ट पर निर्भरता कम हो जाएगी। इसे लेकर हाल ही में एक भारतीय दल ने रूस का दौरा किया है।
₹20,000 करोड़ का संयुक्त निवेश
इस प्रोजेक्ट के लिए कंसल्टेंट के रूप में PDIL (प्रोजेक्ट्स एंड डेवलपमेंट इंडिया लिमिटेड) ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। इस प्रोजेक्ट को लेकर 2025 में MoU पर हस्ताक्षर हुआ था। भारत और रूस के इस संयुक्त उद्यम में करीब 20 हजार करोड़ रुपए का निवेश होना है। इसकी क्षमता 20 लाख टन है।
हर साल 20 लाख टन यूरिया उत्पादन
भारत और रूस की साझेदारी में बनने वाले इस प्लांट में सालाना 20 लाख टन यूरिया का उत्पादन होगा, जो पूरी तरह भारत को आपूर्ति की जाएगी। यह पहल भारत की यूरिया के लिए मिडिल-ईस्ट पर निर्भरता (71%) को कम करने और सस्ती खाद सुनिश्चित करने के लिए की जा रही है।
आयात के लिए नए विकल्प तलाशे
इस बीच अमेरिका-ईरान तनाव के कारण पैदा हुए संकट को देखते हुए भारत सरकार ने 2026 के लिए 25 लाख टन यूरिया के आयात को मंजूरी दी है। यह सप्लाई 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' के रास्ते को छोड़कर अल्जीरिया, नाइजीरिया, ओमान और रूस से सीधे मंगवाई जा रही है।
तीन भारतीय कंपनियां शामिल
रूस के साथ साझेदारी में यूरिया उत्पादन के इस प्रोजेक्ट में इंडियन पोटाश लिमिटेड, राष्ट्रीय केमिकल एवं फर्टिलाइजर (आरसीएफ) और नेशनल फर्टिलाइजर लिमिटेड (एनएफएल) जैसी भारत की तीन कंपनियां शामिल हैं। इसमें भारतीय कंपनियां ₹10 हजार करोड़ और रूसी कंपनी ₹10 हजार करोड़ का निवेश करेंगी।
आयात निर्भरता घटाने की कोशिश
इस प्रोजेक्ट के जरिए भारत खाद के आयात पर निर्भरता कम करना चाहता है। गौरतलब है कि भारत अपनी खेती के लिए नाइट्रोजन आधारित खाद यूरिया पर बहुत ज्यादा निर्भर है। भारत की तीनों कंपनियां 10 हजार करोड़ रुपए का निवेश करेंगी और बाकी 10 हजार करोड़ रुपए रूस की केमिकल कंपनी यूरालकेम ग्रुप लगाएगी।
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