UNSC में भारत ने कहा कि संघर्ष वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हैं। भारत ने मानवीय सहायता सुगम बनाने और प्रतिबंधों से खाद्य व्यापार बाधित न करने की अपील की। पढ़ें पूरी खबर।
न्यूयॉर्क (अमेरिका)। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जारी संघर्ष अब केवल युद्धक्षेत्र तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि इनके असर से वैश्विक खाद्य सुरक्षा भी गंभीर खतरे में पड़ रही है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में कहा कि संघर्षों के मानवीय दुष्परिणामों को कम करना परिषद की तत्काल प्राथमिकता होनी चाहिए। भारत ने सुरक्षित और निर्बाध मानवीय सहायता के साथ-साथ यह सुनिश्चित करने पर जोर दिया कि प्रतिबंधों से खाद्य और कृषि व्यापार प्रभावित न हो।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंगलवार को हुई खुली बहस में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने कहा कि आज के संघर्षों का प्रभाव केवल उस क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता जहां लड़ाई चल रही होती है। उनका असर ऊर्जा बाजार, उर्वरक आपूर्ति, समुद्री परिवहन, मानवीय सहायता की लॉजिस्टिक्स और कृषि व्यापार तक पहुंच रहा है। हरीश ने कहा, "आज के संघर्ष तत्काल युद्धक्षेत्र से कहीं आगे तक असर पैदा कर रहे हैं।" उन्होंने बताया कि क्षेत्रीय संघर्षों के कारण पैदा होने वाली ये बाधाएं दुनिया के दूसरे हिस्सों की खाद्य सुरक्षा को भी प्रभावित कर सकती हैं।
विकासशील देशों पर सबसे ज्यादा असर
भारत ने खास तौर पर उन विकासशील देशों की स्थिति को रेखांकित किया जो खाद्य और अन्य जरूरी वस्तुओं के लिए आयात पर अधिक निर्भर हैं। हरीश के मुताबिक, वैश्विक आपूर्ति शृंखला में किसी भी बड़े व्यवधान का बोझ ऐसे देशों को असमान रूप से उठाना पड़ता है। उन्होंने कहा, "परिषद की तत्काल प्राथमिकता संघर्ष के मानवीय परिणामों को कम करना होना चाहिए। इसके लिए सुरक्षित, तेज और बिना किसी बाधा के मानवीय सहायता की पहुंच सुनिश्चित करना तथा संघर्षरत पक्षों के बीच सैन्य गतिविधियों को टालने संबंधी व्यवस्थाओं का समर्थन करना जरूरी है।"
भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि सुरक्षा परिषद के कदमों, जिसमें प्रतिबंध भी शामिल हैं, से अनजाने में मानवीय सहायता या वैध खाद्य एवं कृषि व्यापार बाधित नहीं होना चाहिए। हरीश ने कहा कि परिषद को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसके उपायों का मानवीय राहत और जरूरी खाद्य आपूर्ति पर प्रतिकूल असर न पड़े।
खाद्य सुरक्षा की जिम्मेदारी राष्ट्रीय सरकारों की
हालांकि भारत ने संघर्षों के दौरान खाद्य संकट को नियंत्रित करने में सुरक्षा परिषद की भूमिका पर जोर दिया, लेकिन हरीश ने खाद्य-सुरक्षित और लचीले समाज के निर्माण की प्राथमिक जिम्मेदारी राष्ट्रीय सरकारों की बताई। उन्होंने कहा कि "खाद्य-सुरक्षित और संकटों का सामना करने में सक्षम समाज का निर्माण मुख्य रूप से राष्ट्रीय सरकारों की जिम्मेदारी है, जिसे संयुक्त राष्ट्र विकास प्रणाली और रोम स्थित एजेंसियों का समर्थन प्राप्त है।"
भारत ने गिनाईं अपनी खाद्य सुरक्षा की पहल
बहस के दौरान भारत ने अपनी घरेलू खाद्य सुरक्षा व्यवस्था का भी उल्लेख किया। हरीश ने कहा कि लगातार किए गए निवेश और नीतिगत प्रयासों ने भारत को खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में मजबूत स्थिति दी है और वह वैश्विक खाद्य स्थिरता में भी महत्वपूर्ण योगदानकर्ता बन सका है। उन्होंने कहा, "राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम सब्सिडी वाले खाद्यान्न का कानूनी अधिकार प्रदान करता है और पीएम-किसान कार्यक्रम के तहत 11 करोड़ से अधिक किसान परिवारों को प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण ने छोटे और सीमांत उत्पादकों की आर्थिक मजबूती को बढ़ाया है।"
भारत ने 2023 में मनाए गए अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष का भी उल्लेख किया। हरीश के अनुसार, इस पहल ने जलवायु-अनुकूल और पोषक तत्वों से भरपूर फसलों पर वैश्विक ध्यान केंद्रित किया और विविधीकृत खाद्य सुरक्षा के लिए इन्हें एक टिकाऊ मॉडल के रूप में सामने लाया। उन्होंने कहा, "डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे और जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों से समर्थित इन प्रयासों ने भारत को खाद्य सुरक्षा बनाए रखने के साथ-साथ वैश्विक खाद्य आपूर्ति में शुद्ध योगदानकर्ता बने रहने में सक्षम बनाया है।"
समुद्री व्यापार पर भारत ने जताई चिंता
खाद्य सुरक्षा पर वैश्विक समुद्री व्यापार और वाणिज्यिक शिपिंग मार्गों में आने वाली रुकावटों के जोखिमों पर भारत ने व्यापक रूप से अपनी बात रखी। हालांकि, हरीश ने अपने संबोधन में किसी खास संघर्ष क्षेत्र का स्पष्ट नाम नहीं लिया। इसके विपरीत, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने वैश्विक खाद्य आपूर्ति के सामने मौजूद तीन प्रमुख भू-राजनीतिक संवेदनशील क्षेत्रों—ब्लैक सी, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और रेड सी—का सीधे तौर पर उल्लेख किया।
गुटेरेस ने कहा, "यूक्रेन में युद्ध ब्लैक सी में यूक्रेन और रूस, दोनों से होने वाले अनाज और ऊर्जा निर्यात को प्रभावित कर रहा है।" उन्होंने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को वैश्विक व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग बताते हुए कहा कि यहां बंदिशों और आवाजाही पर रोक ने जिंसों की कीमतें बढ़ा दी हैं और उनकी उपलब्धता में भारी गिरावट आई है।
गुटेरेस के मुताबिक, होर्मुज से दुनिया की करीब पांचवीं हिस्से की तेल आपूर्ति और वैश्विक उर्वरक व्यापार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा गुजरता है। ऐसे में इस मार्ग में व्यवधान का असर ऊर्जा और खाद्य आपूर्ति दोनों पर पड़ सकता है। उन्होंने कहा, "रेड सी में वाणिज्यिक जहाजों पर हमले खाद्य और अन्य जिंसों की आपूर्ति शृंखलाओं के लिए और बड़ा खतरा पैदा कर रहे हैं।"
होर्मुज में उर्वरक और खाद्यान्न के लिए सुरक्षित कॉरिडोर का प्रस्ताव
वैश्विक आपूर्ति में इस महत्वपूर्ण अड़चन को दूर करने के लिए गुटेरेस ने संयुक्त राष्ट्र की ओर से तैयार किए गए व्यावहारिक ढांचे की जानकारी दी। इसका उद्देश्य होर्मुज में एक संरक्षित कॉरिडोर के जरिए उर्वरकों और खाद्यान्नों की आवाजाही को सुगम बनाना है। गुटेरेस ने कहा, "समयबद्ध विश्वास-निर्माण की यह पहल शुरुआत में उर्वरकों और उनसे जुड़े कच्चे माल पर केंद्रित होगी, लेकिन इसे अन्य उत्पादों तक भी बढ़ाया जा सकेगा।"
उन्होंने बताया कि मार्च में सामने रखे गए शुरुआती प्रस्तावों को आगे बढ़ाते हुए संयुक्त राष्ट्र ने सोमवार को एक अहम कदम उठाया। संयुक्त राष्ट्र परियोजना सेवा कार्यालय (UNOPS) के नेतृत्व में एक टास्क फोर्स ने उर्वरक और संबंधित उत्पादों को ले जाने वाले जहाजों के पंजीकरण और सत्यापन के लिए एक परिचालन ढांचा तैयार किया है। इसका उद्देश्य उर्वरक और संबंधित उत्पाद ले जाने वाले जहाजों का पंजीकरण और सत्यापन करना है, ताकि उनके सुरक्षित और सुगम पारगमन को आसान बनाया जा सके।
गुटेरेस ने राजनीतिक इच्छाशक्ति की अपील की
संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने कहा कि अब इस पहल को आगे बढ़ाने के लिए संबंधित पक्षों के सहयोग और राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। उन्होंने सभी पक्षों से इस प्रस्ताव पर गंभीरता और रचनात्मक तरीके से बातचीत करने की अपील की। गुटेरेस ने कहा, "अब जरूरत पक्षों के सहयोग और राजनीतिक इच्छाशक्ति की है। मैं सभी संबंधित पक्षों से गंभीरता और रचनात्मकता के साथ जुड़ने का आग्रह करता हूं।" समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा, ऊर्जा और उर्वरक आपूर्ति, युद्धों के मानवीय प्रभाव और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध—ये सभी खाद्य उपलब्धता और कीमतों को सीधे प्रभावित करने वाले कारक बन चुके हैं।
विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) के कार्यवाहक निदेशक कार्ल स्काऊ ने भी इसी खतरे की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने चेतावनी दी कि "समुद्री व्यापार में गंभीर व्यवधान अब करोड़ों और लोगों को खाद्य असुरक्षा की ओर धकेलने का खतरा पैदा कर रहे हैं।" संघर्षों के बीच मानवीय राहत और खाद्य आपूर्ति को बाधित होने से बचाने के लिए सुरक्षा परिषद को तत्काल कदम उठाने चाहिए, जबकि दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय सरकारों को अपनी कृषि, सामाजिक सुरक्षा और आपूर्ति प्रणालियों को अधिक लचीला बनाना होगा।
(इनपुट: ANI)
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