प्रेम जो बिना किसी स्वार्थ के किया जाता है..और उसे एक तरह कीआसक्ति कहा जाता है..वहीं भारत में प्रेम के किस्से पौराणिक काल से अब तक चले आ रहे हैं,जिसमें सबसे मशहूर किस्से मध्यकाल के माने जाते हैं..
नकुल जैन, नोएडा
प्रेम, जो बिना किसी भेद-भाव के निस्वार्थ भाव से किया जाता है..ये एक प्रकार की ऐसी आसक्ति है,जिसमें दो आत्माओं का परस्पर मिलन होता है..मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल से प्रेम करने के किस्से सामने आते रहे हैं,.पौराणिक कथाओं में भगवान शंकर और मां पार्वती के प्रेम को सबसे पहला प्रेम प्रसंग माना जाता है..जिसके बाद त्रेता युग से लेकर द्वापर में प्रेम करने के अनेक किस्से सामने आए..वहीं मध्यकालीन युग में भी बहुत सी प्रेम कहानियों का जिक्र सुनने को मिला..हालांकि इस युग में जात-पात, उंच-नीच और धर्म की विषमताएं भी जन्म ले चुकी थी...जिसके चलते प्यार करने वालों को बहुत सी कठिनाईयों का सामना करना पड़ा...भारत में अमीर से लेकर गरीब वर्ग से किसी न किसी ने प्रेम किया है..देश के राजा-महाराज भी इस रस में कई बार डूबे नजर आए..तो आज हम आपको कुछ प्रेम से जुड़े ऐसे ही अनसुने किस्से सुनाने जा रहे हैं,जिसके बारे में शायद ही कभी आपने सुना होगा.......
भारत की प्रेम कहानियों के कुछ अजब-गजब किस्से
सत्ता हाथ में आते ही बना दिया महल
मोहम्मद बिन तुगलक के बेटे और तुगलक वंश के तीसरे शासक फिरोजशाह तुगलक का नाम तो आप सब लोगों ने सुना ही होगा..उनके काल को सफलता की बुलंदियों का सूचक भी माना जाता है..हालांकि उनकी निजी जिंदगी के बारे में बहुत कम ही सुनने को मिलते हैं..फिरोजशाह ने जब भारत की सल्तनत अपने हाथ में नहीं ली थी.उस समय उन्हें एक गुजरी से प्यार हो गया था..फिरोजशाह गुजरी की सुंदरता के इतने कायल हो गए थे कि वह उस पर अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार हो गए थे..गुजरी जो कि एक मामूली सी दूध बेचने वाली थी..उसे उन्होंने एक वादा किया कि वह सत्ता संभालते ही उसे एक महल बनाकर देंगे..जिसको उन्होंने सलतनत हाथ में लेने के बाद पूरा भी किया..बता दें कि फिरोज शाह ने जैसे ही भारत की गद्दी संभाली तो उसने गुजरी को एक महल बनाकर दिया...जिसे आज गुजरी महल के नाम से जाना जाता है..तुगलक बादशाह ने उसे सिर्फ महल ही नहीं बनाकर दिया..ब्लकि उसके लिए एक नगर भी बसाकर दिया..जिसे हम आज हिसार के नाम से भी जानते हैं....
नूरजहां के नूर पर फिदा हुए मुगल सम्राट
मुगलों में सबसे ज्यादा आशिक मिजाज बादशाह सलीम चिश्ती को कहा जाता है..जिनके किस्से हमें अक्सर सुनने को मिल जाते हैं..लेकिन उनसे जुड़े कुछ अतीत ऐसे हैं..जिसके बारे में बहुत ही कम लोगों को मालूम होगा..दरअसल 40 की उम्र पार करने के बाद और 300 रानी होने के बावजूद एक दिन उसे ऐसी बेवा औरत से इश्क हो गए..जो कि उनके महल में एक दासी थी..इतिहासकारों की तरफ से दावा किया जाता है कि एक युद्द के दौरान मुगल बादशाह जहांगीर के सेनानायक की मौत हो गई थी..जिसके बाद उसने उसके परिवार को आगरा अपने पास बुला लिया..और खिदमत करने के लिए काम पर रख लिया..वहीं एक दिन बादशाह बाजार घूमने निकले और उनकी नजर मेहर उन निसा पर पड़ी जो कि शहादत पाने वाले सेनानायक की पत्नी थी और साथ ही महल में दासी का काम करती थी.. बादशाह उसे पहली नजर में देखते ही दीवाने हो गए..और मन ही मन उसे बेइंतहा मोहब्बत करने लगे..फिर एक दिन बादशाह ने हिम्मत जुटाकर निसा को अपने दिल की बात कह ही डाली..बादशाह की बेतहाशा मोहब्बत देखकर निसा उसे ठुकरा न सकी..और उसने जहांगीर के प्यार को स्वीकार कर लिया..हालांकि वो शादी करने को तैयार नहीं थी..क्यों कि उसे लगता था कि मुगलों के दरबार में उसे वो सम्मान नहीं मिल पाएगा जो कि एक बादशाह की बेगम को मिलता है..लेकिन सलीम ने उसे वादा किया कि वह उसे अपने दरबार में सबसे उंचे दर्जे की बेगम बनाकर रखेंगे..जिसके चलते उसने मुगल सम्राट से निकाह कर लिया..वहीं शादी के बाद मुगल बादशाह ने अपना वादा पूरा किया और उसे अपने दरबार में सबसे उंचा दर्ज दिया..वहीं साथ ही उसका नाम निसा से बदलकर नूरजहां रख दिया.. नूरजहां... जिसका मतलब होता है कि जहां में सबसे सुंदर..वैसे नूरजहां थी भी इतनी सुंदर कि बादशाह की तरफ से दी हुई उपमा उसके चेहरे से मेल खाती थी..हालांकि नूरजहां से बादशाह को कोई औलाद नहीं हुई..लेकिन जहांगीर की सलतनत के दौरान हुकूमत सिर्फ उसी की चली..
मिर्जा को मिली मोहब्बत में सजा
पंजाब के दानाबाद में बंजाल समुदाय के मिर्जा को अपने विरोधी सियाल कबीले के प्रमुख खिवा खान की बेटी साहिबा से मोहब्बत हो गई..दोनों का इश्क समुंद्र से भी गहरा था..लेकिन खिवा खान को उनकी मोहब्बत बिल्कुल पसंद नहीं थी.. इस नफरत के बावजूद उन दोनों का प्यार कम न हो सका..वहीं दूसरी तरफ अपने साथ हमेशा तीर कमान रखने वाला मिर्जा धनुष चलाने का शौक भी रखता था और चलाने में माहिर भी था.. एक दिन साहिबा के पिता ने उसकी शादी जबरदस्ती पास के गांव में तय कर दी..वहीं इस की भनक जब मिर्जा को लगी तो वह उसे रातों रात भगाकर अपने साथ ले उड़ा.. जिसके बाद साहिबा के भाइ गुस्से में आग बबूला हो गए और उन्होंने मिर्जा का मारने का निश्चय किया..वहीं मिर्जा और साहिब घर से कहीं दूर भागकर पेड़ के नीचे सोए हुए थे..तभी अचानक साहिबा को अपने भाईयों के आने की आभास हुआ..जिसको देखकर वो घबरा गई..उसे भय लगने लगा कि कहीं मिर्जा उसके सारे भाईयों का मारना दे..क्यों कि उसको पता था कि मिर्जा के तीर के सामने किसी का बचना बेहद मुश्कि था..उसे मोहब्बत से ज्यादा अपने खून के रिश्तों की फिक्र होने लगी..और उसने बिना देरी किए मिर्जा के तरकश में से सारे तीर निकालकर तोड़ दिए.जिसके बाद उसके भाई करीब आने लगे तो उसने मिर्जा को नींद से उठाकर सावधान किया..वहीं मिर्जा ने जब अपने तरकश की तरफ नजर दौडाई तो उसके कमान के सारे तीर टूटकर बिखरे हुए थे..मिर्जा सब कुछ समझ गया था..लेकिन वह इतना सब होने के बाद भी घबराया नही ब्लकि उसने डटकर अपनी धोखेबाज माशूका के भाईयों का सामना किया..और आखिर में अपनी मोहब्बत के लिए हंसते हंसते जान कुर्बान कर दी..
मस्तानी की आशिकी में फनाह हुए बाजीराव
मराठा पेशवा की बात आती है तो छत्रपति शिवाजी के बाद बाजीराव का नाम लिया जाता है..क्यों कि उन्हें शिवाजी की तरह ही बल, बुद्धि और साहस का प्रतीक माना जाता था..हालाकिं बाजीराव के कुछ ऐसे किस्से भी थे..जिसके बारे में बहुत कम लोगों को पता होगा..बाजीराव के पारिवारिक जीवन की बात की जाए तो उन्होंने काशी बाई के साथ शादी की थी..हालांकि उनका इश्क मस्तानी से था..जिसके चलते वह उसे अपने महल में ले आए..लेकिन बाजीराव के परिवार में मस्तानी को सम्मान के बजाए नफरत मिली..उससे मराठा शासन में बड़ी हीन दृष्टि से देखा जाता था..वहीं साथ ही बाजीराव को भी मस्तानी से दूर रखा जाता था..बाजीराव पर परिवार का पूरा दबाव था..लेकिन इन सबके बावजूद भी वो उसके साथ हद से ज्यादा मोहब्बत करते थे..उन्हें मस्तानी से एक लड़का भी हुआ..हालांकि परिवार और समाज की नाराजगी के चलते उनके बीच दूरियां बढ़ती चली गई..जिसके चलते वह मस्तानी के साथ विरह को बर्दाश्त नहीं कर सके..और बीमार रहने लगे..और धीरे-धीरे उनका स्वास्थ्य गिरता चला गया..और फिर एक दिन वह इस दुनिया को छोड़कर हमेशा के लिए अलविदा हो गए..वहीं दूसरी तरफ मस्तानी बाजीराव के जाने का गम बर्दाश्त नहीं कर सकी..और उसने भी अपनी जान दे दी....
हीर-रांझा का अमर हुआ प्रेम
पंजाब के किस्से कहानियों की बात आती है,,और खासतौर पर वो प्रेम से जुड़े हुए तो उसमें सबसे पहले हीर-रांझा का नाम लिया जाता है..किसान परिवार में पैदा रांझा शुरु से ही मस्त मौला था..वहीं घर में सबसे छोटा होने के चलते काम को लेकर उसके पिता भी दबाव नहीं देते थे....लेकिन अचानक एक दिन रांझा के पिता की मौत हो गई..जिसके बाद उसके भाइयों ने उसके साथ जमीन और काम को लेकर झगडा करना शुरू कर दिया..वहीं खुद में मस्त रहने वाला रांझा इन सब चीजों से एक दिन तंग आकर सब कुछ छोड़कर कहीं दूर चला गया..और इधर-उधर काम की तलाश में भटकने लगा..सौभाग्यवश एक दिन उसे दूर के किसी गांव में पशुओं को चराने का काम मिल गया..वहीं उस नौकरी के दौरान रांझा को मालिक की बेटी जिसका नाम हीर था उसे इश्क हो गया..लेकिन एक दिन उनके प्यार के बारे में हीर के चाचा को पता लग गया..और उसने रांझा को गांव से बाहर निकलवा दिया..हीर से विरह के बाद रांझा बिल्कुल बावला हो गया..और एक संत की शरण में जाकर फकीर बन गया..वहीं संत बनने के बाद एक दिन रांझा उसी गांव में पहुंच गया..जहां हीर की शादी हुई थी..दूसरी तरफ हीर को जब रांझा के गांव में आने की खबर लगी तो वो रोजाना भिक्षा के बहाने से मिलने लगी..जिसके चलते फकीर बन चुके रांझा को एक बार फिर से इश्क की खुमारी चढ़ गई..हालांकि उनका ये प्यार ज्यादा दिन न चल सका और एक दिन फकीर के वेश में रांझा होने का पता हीर के पिता को लग गया.और उसने रांझा को गांव से एक फिर से बाहर निकाल दिया..हालांकि राजा के पास जब दोनों के इश्क मामला पहुंचा तो उन्होंने रांझा के पिता को हीर के साथ रांझा की शादी करने का आदेश दिया...हीर के पिता किसी कीमत में रांझा के साथ अपनी बेटी की शादी नहीं करना चाहते थे..इसलिए वह उसको खाने में जहर देकर मार देते हैं....वहीं जब रांझा को इस बारे में पता चलता है तो वह भी उसी खाने को खाकर अपनी जान दे देता है..इस तरह दोनों मरकर भी अपने इश्क को अमर कर देते हैं..और हमेशा के लिए सच्ची मोहब्बत की एक दर्दनाक दांस्ता बनकर रह जाते हैं...