दिल्ली-एनसीआर और उत्तर भारत इस वक्त सिर्फ कड़ाके की ठंड नहीं, बल्कि कोहरा, स्मॉग और जहरीले वायु प्रदूषण की तिहरी मार झेल रहे हैं।
नई दिल्ली। दिल्ली-एनसीआर और उत्तर भारत इस वक्त सिर्फ कड़ाके की ठंड नहीं, बल्कि कोहरा, स्मॉग और जहरीले वायु प्रदूषण की तिहरी मार झेल रहे हैं। यह संकट अब केवल मौसम से जुड़ी परेशानी नहीं रह गया है, बल्कि यह जनजीवन, स्वास्थ्य, यातायात और सुरक्षा के लिए एक बड़े खतरे के रूप में सामने आ चुका है। सड़कों पर सिमटती दृश्यता, आसमान में छाई धुंध की मोटी परत और सांसों में घुलते सूक्ष्म प्रदूषक कण यह संकेत दे रहे हैं कि उत्तर भारत एक गंभीर पर्यावरणीय और मानवीय संकट के दौर से गुजर रहा है। बीते कुछ दिनों में एक्सप्रेसवे और हाईवे पर हुए भीषण हादसे इस बात की गवाही दे रहे हैं कि कोहरा और प्रदूषण का यह मेल कितना घातक साबित हो सकता है।
उत्तर भारत में कोहरा और प्रदूषण के कारण स्थिति गंभीर
उत्तर भारत में सर्दी का मौसम हर साल कोहरे और प्रदूषण के साथ आता है, लेकिन इस बार हालात कहीं ज्यादा गंभीर नजर आ रहे हैं। दिसंबर के मध्य तक दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, पश्चिमी और पूर्वी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में घना से बहुत घना कोहरा छा गया है। मौसम की यह स्थिति ऐसे समय में बनी है, जब हवा की गति बेहद कम है और तापमान लगातार गिर रहा है। ठंडी और शांत हवाओं के कारण प्रदूषण के कण ऊपर उठने के बजाय ज़मीन के पास ही जमा हो रहे हैं। यही वजह है कि स्मॉग की मोटी परत दिन में भी आसमान को ढक रही है और दृश्यता कई इलाकों में 20 से 30 मीटर तक सिमट चुकी है, जबकि कुछ एक्सप्रेसवे और खुले क्षेत्रों में यह लगभग शून्य के करीब पहुंच गई है।
दिल्ली-एनसीआर में लगातार 'सीवियर' श्रेणी में बना हुआ है AQI
उत्तर भारत के शहरों, खासकर दिल्ली-एनसीआर में इस समय AQI लगातार 'सीवियर' यानी गंभीर श्रेणी में बना हुआ है। कई इलाकों में AQI 450 से ऊपर दर्ज किया जा रहा है, जो स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक स्थिति को दर्शाता है। यह स्तर न सिर्फ बुजुर्गों और बीमार लोगों, बल्कि स्वस्थ व्यक्तियों के लिए भी गंभीर जोखिम पैदा करता है। सुबह और रात के समय स्थिति और ज्यादा खराब हो जाती है, क्योंकि इन घंटों में तापमान कम होता है और वातावरण में नमी बढ़ जाती है, जिससे कोहरा और स्मॉग और घना हो जाता है।
सड़क, रेल और हवाई यातायात पर भी पड़ रहा असर
इस गंभीर स्थिति का सीधा और खतरनाक असर यातायात पर देखने को मिल रहा है। दिल्ली-एनसीआर की सड़कों से लेकर उत्तर प्रदेश और हरियाणा के एक्सप्रेसवे तक, हर जगह वाहन चालकों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। घने कोहरे के कारण दृश्यता बेहद कम हो जाती है, जिससे तेज रफ्तार से चल रहे वाहन समय पर ब्रेक नहीं लगा पाते और बड़े हादसों का शिकार हो जाते हैं। बीते कुछ दिनों में उत्तर भारत के अलग-अलग एक्सप्रेसवे पर हुए भीषण हादसे इस खतरे की भयावह तस्वीर पेश करते हैं।
प्रदूषण और कोहरे की यह स्थिति सिर्फ सड़क हादसों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर रेल और हवाई यातायात पर भी पड़ रहा है। घने कोहरे के कारण कई ट्रेनें देरी से चल रही हैं या रद्द की जा रही हैं। हवाई अड्डों पर भी विजिबिलिटी बेहद कम होने के चलते उड़ानों में देरी और डायवर्जन देखने को मिल रहे हैं। यात्रियों को घंटों इंतजार करना पड़ रहा है, जिससे असुविधा के साथ-साथ आर्थिक नुकसान भी हो रहा है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बताए प्रदूषण के दुष्प्रभाव
डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक ऐसे प्रदूषण के संपर्क में रहने से सांस की बीमारियां, दिल से जुड़ी समस्याएं, आंखों में जलन, सिरदर्द और थकान जैसी शिकायतें तेजी से बढ़ रही हैं। PM 2.5 जैसे सूक्ष्म कण सीधे फेफड़ों में जाकर सूजन पैदा करते हैं और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर देते हैं। बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं के लिए यह स्थिति बेहद खतरनाक मानी जा रही है।
हालात को संभालने के लिए प्रशासन ने उठाए GRAP-4 जैसे सख्त कदम
प्रशासन की ओर से हालात को संभालने के लिए GRAP-4 जैसे सख्त कदम उठाए गए हैं। निर्माण कार्यों पर रोक, पुराने वाहनों पर पाबंदी और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने जैसे उपाय लागू किए गए हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि ये कदम तात्कालिक राहत तो दे सकते हैं, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं हैं। जब तक प्रदूषण के मूल कारणों—जैसे वाहनों का बढ़ता उत्सर्जन, निर्माण से उड़ती धूल, औद्योगिक प्रदूषण और पराली जलाने—पर सख्ती से नियंत्रण नहीं किया जाता, तब तक यह संकट हर साल और गंभीर होता जाएगा।
मौसम विशेषज्ञों को उम्मीद है कि आने वाले दिनों में यदि पहाड़ी इलाकों में अच्छी बर्फबारी होती है और तेज हवाएं चलती हैं, तो प्रदूषण से कुछ राहत मिल सकती है। लेकिन यह राहत अस्थायी होगी। दीर्घकालिक समाधान के लिए नीति स्तर पर ठोस कदम, तकनीकी सुधार और जनभागीदारी बेहद जरूरी है।
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