ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए शी जिनपिंग के भारत दौरे के बीच, तिब्बती नेता पेनपा त्सेरिंग ने चीन को कड़ा संदेश दिया है। उन्होंने तिब्बत मुद्दे को बातचीत के जरिए सुलझाने की नसीहत दी है।
धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश)। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (BRICS Summit) में हिस्सा लेने के लिए चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भारत दौरे से ठीक पहले, निर्वासित तिब्बती नेतृत्व ने चीन को एक कड़ा और सीधा कूटनीतिक संदेश दिया है। केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (CTA) के सिक्योंग (राजनीतिक नेता) पेनपा त्सेरिंग ने शी जिनपिंग से तिब्बत मुद्दे को बातचीत के जरिए सुलझाने की अपील करते हुए कहा है कि दुनिया में शांति कायम करने से पहले चीन को अपने घर से इसकी शुरुआत करनी चाहिए।
भारत-चीन संबंधों का बदलता समीकरण और तिब्बत
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए शी जिनपिंग की यह भारत यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब पूरी दुनिया की निगाहें भारत-चीन संबंधों और उभरती वैश्विक व्यवस्था पर टिकी हैं। इसी कूटनीतिक हलचल के बीच, सिक्योंग पेनपा त्सेरिंग ने इस अनसुलझे तिब्बत मुद्दे की ओर दुनिया का ध्यान खींचने की कोशिश की है। हालांकि, तिब्बती नेता ने भारत और चीन के बीच सुधरते द्विपक्षीय संबंधों का स्वागत किया है। मीडिया से बातचीत में त्सेरिंग ने स्पष्ट किया कि ब्रिक्स सम्मेलन को बहुपक्षीय मंचों पर चीन की बढ़ती सक्रियता के बड़े संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि तिब्बती नेतृत्व ने हमेशा भारत और चीन सहित अन्य देशों के बीच बेहतर संबंधों का समर्थन किया है। लेकिन उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि इस कूटनीतिक प्रक्रिया में तिब्बती लोगों की आकांक्षाओं को कतई भुलाया नहीं जा सकता।
'चीन पर भरोसा करना सबसे बड़ी चुनौती'
तिब्बती नेता ने स्वीकार किया कि चीनी सरकार के साथ किसी भी तरह के कूटनीतिक व्यवहार में 'भरोसा' सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। इसके बावजूद, उन्होंने यह स्पष्ट किया कि बातचीत ही आगे बढ़ने का एकमात्र व्यावहारिक रास्ता है। जब उनसे पूछा गया कि क्या वह राष्ट्रपति शी जिनपिंग को तिब्बतियों के साथ संवाद फिर से शुरू करने का कोई संदेश देना चाहते हैं, तो सिक्योंग ने तिब्बती नेतृत्व की 'मध्यम मार्ग नीति' (Middle Way Policy) के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। यह नीति तिब्बत मुद्दे का बातचीत के जरिए समाधान तलाशने पर केंद्रित है।
शी जिनपिंग को सीधा और कड़ा संदेश
पेनपा त्सेरिंग ने चीन की वैश्विक शांति की बातों पर तंज कसते हुए सबसे कड़ी अपील की। समाचार एजेंसी एएनआई के एक सवाल का जवाब देते हुए त्सेरिंग ने कहा, "यदि चीन वास्तव में इस दुनिया को रहने के लिए एक बेहतर जगह बनाने के प्रति गंभीर है, तो सबसे पहले उसे चीन को रहने के लिए एक बेहतर स्थान बनाना चाहिए।" उनका स्पष्ट तर्क था कि व्यापक दुनिया में शांति की शुरुआत सबसे पहले अपने ही देश और समाज के भीतर से होनी चाहिए। उन्होंने चीनी नेतृत्व से सीधा सवाल करते हुए पूछा, "आपको और कितनी जमीन की जरूरत है? अगर शांति स्थापित करनी है, तो इसकी शुरुआत अपने घर से होनी चाहिए। जब आपके अपने घर में शांति नहीं है, तो आप बाहरी दुनिया में शांति की बात कैसे कर सकते हैं?"
कूटनीति और 'नो वॉर' के दावों पर सवाल
सिक्योंग ने तिब्बतियों के साथ सीधे संवाद का आह्वान करते हुए चीन की दोहरी नीति पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने सवाल उठाया कि चीन एक तरफ बातचीत, कूटनीति और 'नो वॉर' (युद्ध-रहित दुनिया) की वकालत कैसे कर सकता है, जबकि वह तिब्बती पक्ष के साथ जुड़ने से कतराता है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, "जब आप बातचीत, संवाद, कूटनीतिक संबंधों और युद्ध नहीं होने की बात करते हैं, तो तिब्बतियों के साथ भी ऐसा करें। तिब्बत मुद्दे के समाधान के लिए तिब्बतियों से बातचीत करें।"
चीन की बदलती घरेलू नीतियां और वैश्विक प्रभाव
त्सेरिंग ने तिब्बतियों, उइगरों, मंगोलियाई लोगों, हांगकांग और ताइवान को लेकर चीन की बदलती घरेलू नीतियों और कानूनों का भी विशेष रूप से जिक्र किया। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि इन कड़े बदलावों को वैश्विक भू-राजनीति में चीन की व्यापक भूमिका के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए। अंत में, उन्होंने कहा कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के प्रभाव का आकलन अभी करना जल्दबाजी होगी। इसके साथ ही, पूरी दुनिया की नजरें सम्मेलन से इतर होने वाली भारत और चीन के बीच संभावित द्विपक्षीय बैठक पर भी बारीकी से टिकी रहेंगी।
(भाषांतर: Ravi Pandey । इनपुट: ANI)
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