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सात करोड़ साल पहले भारत में हुई थी धान की उत्पत्ति

करीब 7 करोड़ साल पहले भारत में धान (ओराइजा) की उत्पत्ति हुई थी। जबलपुर (मध्य प्रदेश) के डिंडौरी इलाके में टाइटैनोसोरस डायनासोर के जीवाश्मीकरण हुए गोबर (कॉप्रोलाइट) में धान के जीवाश्म मिले।

सात करोड़ साल पहले भारत में हुई थी धान की उत्पत्ति

Rice originated in India 70 million years ago | prime news network

विजय नारायण सिंह

धान की उत्पत्ति सात करोड़ साल पहले भारत में पुरा क्रेटेशियस काल में हुई थी। इसकी पुष्टि जबलपुर के पास डिंडौरी में मिले जीवाश्मों (फाइटोलिथ्स) से हुई है। यह जीवाश्म 66-70 मिलियन साल पुराने हैं। इसके साक्ष्य जीवाश्म के रूप में भूवैज्ञानिक अभिलेखों (Geological records) में मौजूद हैं। यह समय डायनासोरों के विलुप्त होने से पहले का है।

  • टाइटैनोसोरस के गोबर में मिला था धान का जीवाश्म
  • उस समय गोंडवाना महाद्वीप से जुड़ा था भारतीय द्वीप
  • चावल जैसी प्रजातियां डायनासोर युग में भी थीं मौजूद

रोचक बात यह है कि जिस समय ओराइजा जाति (चावल का वैज्ञानिक नाम) विकसित हो रही थी, उसी समय इस इलाके में डायनासोर की मौजूदगी भी थी। इसके जीवाश्म भी शाकाहारी टाइटैनोसोरस के गोबर से मिले हैं। यहाँ ज्वालामुखी जैसी भूगर्भीय गतिविधियों के कारण एक संरचना बनी, जिसे भूवैज्ञानिकों ने लमेटा फॉर्मेशन नाम दिया। यही संरचना अपने अंदर प्रकृति के इतिहास के कई राज छिपाए हुए है। इन्हीं में से एक है धान (ओराइजा) की उत्पत्ति का रहस्य।

यह शोध पंजाब विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर एडवांस्ड स्टडीज़ इन जियोलॉजी के प्रोफेसर राजीव पटनायक, बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज की वैज्ञानिक वंदना प्रसाद और अशोक साहनी की टीम ने किया। शोध नेचर कम्युनिकेशन में प्रकाशित हो चुका है।

शोध के अनुसार भारत पुरा क्रेटेशियस काल में एक अलग द्वीप था, जो दक्षिणी गोलार्ध में गोंडवाना महाद्वीप का हिस्सा था। टीम ने इस इलाके में जीवाश्मों के आधार पर शुरुआती पोएसी परिवारों का अध्ययन किया। इसमें चावल, गेहूं जैसी अनाज वाली घासें शामिल हैं। वनस्पति शास्त्र में पौधों की विभिन्न प्रजातियों को उनके लक्षणों के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। पोएसीउसी वर्गीकृत परिवार की एक कड़ी है।

यह खोज भारत को चावल की खेती के प्रारंभिक केंद्रों में से एक के रूप में स्थापित करती है। यह वह समय था जब पृथ्वी पर कई बड़े बदलाव हो रहे थे। लमेटा संरचना और उसकी तलछट के अध्ययन से पता चला कि उस समय यह इलाका नदी प्रधान, आर्द्र और उप-उष्णकटिबंधीय था। ऐसी परिस्थितियाँ घास और अन्य पौधों के विकास के लिए पर्याप्त अनुकूल थीं।

यह जीवाश्म सिलिका आधारित संरचनाएँ हैं, जो पौधों की कोशिका की दीवारों में पाई जाती हैं। इस शोध की भारतीय उपमहाद्वीप में चावल की अति प्राचीन खेती और उनकी उत्पत्ति के अध्ययन में महत्वपूर्ण भूमिका हो गई है।

धान की प्रजातियां

ओराइजा जीनस में करीब 20 से 24 प्रजातियां होती हैं। इनमें से कुछ खेती के लिए और कुछ जंगली रूप में जानी जाती हैं। ओराइजा सतीवा, ओराइजा रूफीपोगोन और ओराइजा निवारा जैसी प्रजातियां प्राचीन खेती और चावल की उत्पत्ति के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण हैं।

प्रोफेसर पटनायक और उनके सहयोगियों ने धान यानी चावल जैसे पौधों के जीवाश्मों के साथ ही कई अन्य सूक्ष्म जीवाश्मों की भी खोज की। यह इलाका डायनासोर के अंडों और हड्डियों के जीवाश्मों के लिए भी प्रसिद्ध है। आज वहाँ शोधकर्ताओं के लिए फॉसिल्स पार्क बनाकर पूरे इलाके को संरक्षित कर दिया गया है।

टाइटैनोसोरस के गोबर से मिला जीवाश्म

डिंडौरी के आसपास कई तरह के जीव-जंतुओं के साथ पेड़-पौधों के जीवाश्म मिले हैं। डायनासोरों की विभिन्न प्रजातियों की हड्डियों और अंडों के जीवाश्म भी मिले हैं। साथ ही टाइटैनोसोरस का जीवाश्मीकरण हुआ गोबर भी मिला। यह चूना मिट्टी जैसा दिख रहा था। शोधकर्ताओं ने पहले इसका पाउडर बनाया, फिर इसे तरल बनाया गया। इसी तरल में पोएसी परिवार की घास-फूस मिली। उनमें मिले सिलिका के आधार पर धान के पोएसी परिवार की पहचान की गई।

इसके गोबर की विशेषता यह रही कि यह पूरी तरह अकार्बनिक था। इसमें कोई कार्बनिक तत्व नहीं पाया गया।

जीवाश्मों की पहचान कैसे हुई?

चावल जैसे अनाज के पौधे अपनी तनों की कोशिकाओं की दीवारों पर सिलिका जमा करते हैं। जीवाश्म बनने के बाद इनमें डीएनए होने की संभावना समाप्त हो जाती है। ऐसे में सिलिका (फाइटोलिथ) के आकार और संरचना से घास की प्रजातियों की पहचान की जाती है।

चावल की कोशिका में जमा सिलिका का आकार और संरचना डमरू और क्रॉस की तरह होता है। यही आकार निर्धारित करता है कि यह चावल का जीवाश्म है। ओराइजा प्रजाति की अन्य घासों में जमा सिलिका की संरचना और आकार बिल्कुल अलग होते हैं। सभी एक-दूसरे से मेल नहीं खाते। कभी-कभी चावल के परागकण भी जीवाश्म के रूप में मिल सकते हैं।

चावल के दाने या भूसी कार्बनयुक्त रूप में भी मिलते हैं। यह अवशेष नदियों, झीलों या दलदल में दब जाने से कार्बनयुक्त रूप में मिलते हैं।