नागपुर में आरएसएस के शताब्दी विजयादशमी उत्सव पर मोहन भागवत ने हिमालयी क्षेत्र के असंतुलित विकास पर चिंता जताई। साथ ही सनातन दृष्टिकोण, सोशल मीडिया नियंत्रण और नशामुक्ति पर जोर दिया।
नागपुर (महाराष्ट्र)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने नागपुर स्थित रेशमबाग मैदान में आयोजित संघ के शताब्दी विजयादशमी उत्सव को संबोधित करते हुए हिमालयी क्षेत्र में हो रहे असंतुलित और एकतरफ़ा विकास पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने चेताया कि इस प्रकार की विकासात्मक अस्थिरता के कारण भारी मानवीय क्षति हो रही है।
हिमालयी अस्थिरता और विकास का नया मॉडल
महाराष्ट्र के नागपुर में आयोजित ऐतिहासिक शताब्दी विजयादशमी उत्सव को संबोधित करते हुए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने नेपाल में हाल ही में आई 'हिमालयी सुनामी' और अन्य प्राकृतिक आपदाओं का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले देशों (भारत, तिब्बत, भूटान और चीन) में एकतरफ़ा विकास की होड़ प्रकृति में भारी अस्थिरता पैदा कर रही है।
भागवत ने कहा, "इस तरह की प्राकृतिक आपदाओं में 1,400 से ज़्यादा लोगों की जान जा चुकी है और 6,000 से अधिक लोग लापता हैं। बाढ़ और हिमस्खलन से 70,000 से अधिक लोग सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं। तकनीकी प्रगति के बावजूद इंसानी जिंदगियों का इस तरह जाना दुखद है। हमें विकास का एक ऐसा व्यापक, टिकाऊ और संतुलित दृष्टिकोण अपनाना होगा जो पारिस्थितिकी (Ecology) और मानव कल्याण दोनों को साथ लेकर चले।"
भारत का सनातन दृष्टिकोण और 'हिंदू' पहचान
अपने संबोधन में संघ प्रमुख ने भारत के सनातन विज़न को रेखांकित करते हुए इसे पूरी दुनिया को एक एकीकृत इकाई के रूप में देखने वाला बताया। उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों ने इसे 'सा प्रथमा संस्कृति विश्वरा' की संज्ञा दी थी।
उन्होंने स्पष्ट किया कि 'हिंदू' दृष्टिकोण किसी विशेष उपासना पद्धति, खान-पान, रीति-रिवाज या भाषा को अनिवार्य नहीं बनाता है। यह मानवता और संस्कृति का धर्म है जो सार्वभौमिक भाईचारे, आध्यात्मिकता और वैश्विक एकता के मूल्यों पर आधारित है। यह विभिन्न पहचानों को आपस में जोड़े रखने की असीम क्षमता रखता है।
सोशल मीडिया, ओटीटी और नई पीढ़ी की चुनौतियाँ
डिजिटल युग के दुष्प्रभावों पर चिंता जताते हुए भागवत ने कहा कि आज सोशल मीडिया के माध्यम से सूचनाओं की भरमार है, लेकिन नई पीढ़ी के पास उस सूचना को छानने और समझने का 'विवेक' (Discernment) होना आवश्यक है। विवेक के अभाव में इसके गंभीर सामाजिक परिणाम सामने आ रहे हैं।
उन्होंने ओटीटी प्लेटफॉर्म्स (OTT Platforms) का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार और प्रशासन अपने स्तर पर नियम बनाएंगे ही, लेकिन समाज और परिवार का यह दायित्व है कि वे नई पीढ़ी को सही और गलत के बीच का भेद करना सिखाएं।
नशामुक्ति: एक गंभीर राष्ट्रीय समस्या
संबोधन के अंत में मोहन भागवत ने नशीली दवाओं के दुरुपयोग (Drug Abuse) को एक विकराल राष्ट्रीय समस्या करार दिया। उन्होंने कहा कि केवल यह जानकारी होना पर्याप्त नहीं है कि नशे की वस्तुएं हानिकारक हैं, बल्कि इस आदत से उबरने के लिए सामूहिक सामाजिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। समाज, शासन और प्रशासन तीनों को मिलकर इस चुनौती से समय रहते निपटना होगा।
(भाषांतर: Ravi Pandey । इनपुट: ANI)
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