Supreme Court : सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालयों और अन्य शिक्षण संस्थानों में आत्महत्या की घटनाओं को देखते हुए एक अहम आदेश में कहा है..
Supreme Court : सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालयों और अन्य शिक्षण संस्थानों में आत्महत्या की घटनाओं को देखते हुए एक अहम आदेश में कहा है कि सरकारी और निजी उच्च शिक्षण संस्थान किसी भी विद्यार्थी को परीक्षा देने से नहीं रोक सकते। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में यह भी कहा है कि किसी विद्यार्थी को छात्रावास से नहीं निकाला जाना चाहिए, कक्षाओं में भाग लेने से प्रतिबंधित नहीं करना चाहिए या छात्रवृत्ति वितरण में देरी के कारण मार्क्सशीट और डिग्री नहीं रोकनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी शिक्षण संस्थानों को निर्देश दिए कि आत्महत्या, विशेष रूप 15-29 वर्ष आयु वर्ग के युवकों की खुदकुशी से जुड़े आंकड़ों को केंद्रीय रूप से संरक्षित किया जाए, ताकि उच्च शिक्षण संस्थानों में आत्महत्या से मौतों का बेहतर और अधिक सटीक अनुमान लगाया जा सके। हर आवासीय संस्थान 24 घंटे चिकित्सा सहायता उपलब्ध हो। परिसर में न हो, एक किमी के दायरे में निश्चित रूप से होनी ही चाहिए।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा, उच्च शिक्षण संस्थानों में समग्र रूप से सुरक्षित, समान, समावेशी और शिक्षा का अनुकूल वातावरण होना चाहिए। यह इन संस्थानों का मूलभूत कर्तव्य है। वे इससे पीछे नहीं हट सकते। छात्रों की आत्महत्या को उनकी पीड़ा और कल्याण से जुड़ी विशाल समस्या का छोटा सा हिस्सा मानते हुए शीर्ष अदालत ने कहा, कुलपति, रजिस्ट्रार और महत्वपूर्ण संस्थागत एवं प्रशासनिक पदों पर रिक्तियों पर चार महीने में नियुक्तियां की जानी चाहिए। सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि संस्थानों के सुचारु संचालन के लिए इन पदों के खाली होने की तिथि से एक महीने में भर जाएं। सभी संस्थानों को केंद्र और राज्य सरकारों को सालाना रिपोर्ट देनी होगी कि कितने आरक्षित पद रिक्त हैं और कितने भरे गए हैं।
अदालत ने कहा, संस्थानों में रिक्त सभी शैक्षणिक व 'गैर-शैक्षणिक पदों को चार महीने के भीतर भरा जाए। देशभर के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए बृहस्पतिवार को जारी व्यापक दिशा-निर्देश में यह भी कहा कि किसी विद्यार्थी की आत्महत्या या अप्राकृतिक मृत्यु की सूचना तत्काल पुलिस को दी जानी चाहिए।
पीठ ने कहा, भर्ती में हाशिये और अल्पप्रतिनिधित्व वाले समुदायों के आरक्षित पदों को प्राथमिकता दी जाए। इनमें दिव्यांगों के पद भी हैं। नियमानुसार आरक्षित संकाय सदस्यों की भर्ती के लिए विशेष अभियान चलाए जा सकते हैं।
कोर्ट ने एक अहम आदेश में कहा कि किसी विद्यार्थी को छात्रावास से नहीं निकाला जाना चाहिए, कक्षाओं में भाग लेने से प्रतिबंधित नहीं करना चाहिए या छात्रवृत्ति वितरण में देरी के कारण मार्क्सशीट और डिग्री नहीं रोकनी चाहिए।
ऐसी किसी भी संस्थागत नीति को सख्ती से देखा जाना चाहिए। पीठ ने निर्देश दिए, संस्थान ऐसे सभी नियमों का पूरी तरह पालन करें, जो उन पर बाध्यकारी प्रभाव डालते हैं। इनमें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का उच्च शिक्षा संस्थानों में रैगिंग पर अंकुश लगाने संबंधी विनियमन, 2009 और अन्य प्रावधान शामिल हैं। सभी छात्रवृत्ति वितरण चार महीने में हो। भविष्य में भी समयसीमा सुनिश्चित की जाए।
सुप्रीम कोर्ट पीठ ने अपने आदेश में कहा कि, सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को किसी भी विद्यार्थी की आत्महत्या या अप्राकृतिक मृत्यु, चाहे परिसर के अंद हो या बाहर, की जानकारी तुरंत पुलिस को देनी होगी। यह निर्देश सभी विद्यार्थियों के लिए लागू होगा, चाहे वे नियमित दूरस्थ शिक्षा वाले हों या ऑनलाइन शिक्षा प्राप्त कर रहे। पीठ ने यह भी कहा, केंद्रीय विश्वविद्यालयों और राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों या किसी भी ऐसे संस्थान, जो उच्च शिक्षा संस्थान के ढांचे में नहीं आते, इसकी सूचना केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग को देनी होगी।
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