सुप्रमी कोर्ट ने धार्मिक आयोजनों और राजनीतिक रैलियों जैसे बड़े सार्वजनिक कार्यक्रमों में भगदड़ रोकने से जुड़े मुद्दे पर फिलहाल किसी व्यापक दिशा-निर्देश देने से गुरुवार को इनकार कर दिया है।
नयी दिल्ली। सुप्रमी कोर्ट ने धार्मिक आयोजनों और राजनीतिक रैलियों जैसे बड़े सार्वजनिक कार्यक्रमों में भगदड़ रोकने से जुड़े मुद्दे पर फिलहाल किसी व्यापक दिशा-निर्देश देने से गुरुवार को इनकार कर दिया है। कोर्ट ने साफ किया कि इस तरह के मामलों में नीति और व्यवस्था से जुड़े पहलुओं पर पहले संबंधित संस्थानों को आगे आना चाहिए।
याचिकाकर्ता को गृह मंत्रालय और चुनाव आयोग जाने की छूट
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची एवं न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने याचिकाकर्ता को यह मामला केंद्रीय गृह मंत्रालय और निर्वाचन आयोग के समक्ष आगे बढ़ाने की अनुमति दी। पीठ ने कहा कि तुम्बलम गूटी वेंकटेश द्वारा दायर याचिका में केंद्र को बड़ी संख्या में लोगों के जमावड़े वाले सार्वजनिक आयोजनों के दौरान भीड़ प्रबंधन एवं सुरक्षा के संबंध में बाध्यकारी मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार करने और लागू करने का निर्देश दिए जाने का अनुरोध किया गया है।
भीड़ प्रबंधन के लिए बाध्यकारी एसओपी की मांग
कोर्ट ने कहा, "आचार संहिता लागू रहने के दौरान देशभर में होने वाली राजनीतिक रैलियों में एसओपी को लागू करने के लिए भी इसी तरह के निर्देश जारी किए जाने का अनुरोध किया गया है। याचिकाकर्ता ने राष्ट्रीय भीड़ प्रबंधन सुरक्षा संहिता तैयार किए जाने का भी अनुरोध किया है।" पीठ ने कहा, "याचिकाकर्ता ने 18 दिसंबर, 2025 को दिए गए अभ्यावेदन में ये मुद्दे उठाए थे।" उसने कहा कि यह मुद्दा सार्वजनिक आयोजनों और सभाओं में कानून-व्यवस्था बनाए रखने को लेकर राज्यों और केंद्र की जिम्मेदारी के इर्द-गिर्द घूमता है।
नीति निर्माण में विशेषज्ञ संस्थानों की भूमिका अहम
पीठ ने कहा, "नीति निर्माण के लिए दिशा-निर्देश जारी किए जाने का अनुरोध किया जा रहा है जिसके लिए कानून एवं व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियों के विशेषज्ञ अधिक उपयुक्त हैं।" न्यायालय ने कहा कि, "चूंकि याचिकाकर्ता पहले ही गृह मंत्रालय से संपर्क कर चुका है, इसलिए इस स्तर पर याचिका का निपटारा किया जा रहा है। साथ ही याचिकाकर्ता को यह छूट दी गई है कि वह भारत सरकार के समक्ष अपनी बात आगे रखे और उसकी एक प्रति निर्वाचन आयोग को भी सौंपे। अदालत ने यह फैसला सक्षम प्राधिकारी पर छोड़ा है कि वे इसे जरूरी समझें तो इस पर विचार करें।"
अदालत ने व्यापक निर्देशों की व्यवहारिकता पर उठाया सवाल
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा, "क्या हम ऐसे निर्देश दे सकते हैं?" उसने भीड़ नियंत्रण के लिए न्यायालय द्वारा अनिवार्य एवं व्यापक दिशानिर्देशों की व्यवहार्यता को लेकर आशंका व्यक्त की। याचिकाकर्ता के वकील ने इस सवाल के जवाब में कहा कि न्यायालय ने पहले भी नीति संबंधी ऐसे मामलों में हस्तक्षेप किया है जिनमें कमजोर लोगों का जीवन खतरे में था। उन्होंने बेघर, मानसिक रूप से निशक्त व्यक्तियों से जुड़ी एक पूर्व जनहित याचिका का हवाला दिया जिसमें अदालत ने एसओपी बनाने का निर्देश दिया था।
रैलियों की अनिश्चित भीड़ पर कोर्ट की चिंता
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, "मान लीजिए कि कुछ लोग अपने मौलिक अधिकार का इस्तेमाल करते हुए दिल्ली में धरना देना चाहते हैं। हम इसे इस तरह विनियमित कर सकते हैं कि किसी को परेशानी न हो और साथ ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी सुरक्षित रहे लेकिन अगर कहा जाए कि चेन्नई में कोई रैली होनी है, मैदान में 10,000 लोग आ सकते हैं लेकिन 50,000 पहुंच जाएं, तो फिर हम क्या करें?"
अधिकारियों को 'सांस लेने का समय' देने की बात
पीठ ने कहा कि अभ्यावेदन 18 दिसंबर को दिया गया था और शीर्ष अदालत में दाखिल करने के लिए याचिका 21 दिसंबर को तैयार हुई। प्रधान न्यायाधीश ने जनहित याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि अधिकारियों को "सांस लेने का कुछ समय" दिया जाना चाहिए।
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