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सतह गति का जलवायु पर बड़ा असर

पृथ्वी की सतह की गति का जलवायु पर अनुमान से कहीं अधिक असर : नए अध्ययन में खुलासा

सिडनी, 21 जनवरी (द कन्वरसेशन) पृथ्वी के इतिहास में जलवायु में बड़े उतार-चढ़ाव आते रहे हैं। कभी यह अत्यधिक ठंडे ‘आइसहाउस’ दौर में रही तो कभी गर्म ‘ग्रीनहाउस’ अवस्था में पहुंची।

पृथ्वी की सतह की गति का जलवायु पर अनुमान से कहीं अधिक असर  नए अध्ययन में खुलासा

Tectonic Plates |

सिडनी, 21 जनवरी (द कन्वरसेशन)

सिडनी, 21 जनवरी (द कन्वरसेशन) पृथ्वी के इतिहास में जलवायु में बड़े उतार-चढ़ाव आते रहे हैं। कभी यह अत्यधिक ठंडे ‘आइसहाउस’ दौर में रही तो कभी गर्म ‘ग्रीनहाउस’ अवस्था में पहुंची। वैज्ञानिक लंबे समय से इन बदलावों को वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में उतार-चढ़ाव से जोड़ते रहे हैं, लेकिन नया शोध बताता है कि इस कार्बन का स्रोत और इसके पीछे काम करने वाली शक्तियां उससे कहीं अधिक जटिल हैं जितना उनके बारे में अब तक समझा गया है।

शोध में सामने आया है कि पृथ्वी की टेक्टोनिक प्लेटों की सतह पर होने वाली हलचल जलवायु को प्रभावित करने में एक अहम और अब तक कम आंकी गई भूमिका निभाती है। कार्बन केवल वहां से नहीं निकलता, जहां टेक्टोनिक प्लेटें आपस में टकराती हैं, बल्कि उन क्षेत्रों से भी निकलता है, जहां ये प्लेटें एक-दूसरे से दूर होती हैं।

54 करोड़ वर्षों का जलवायु और टेक्टोनिक विश्लेषण

जर्नल ‘कम्युनिकेशंस अर्थ एंड एनवायरनमेंट’ में प्रकाशित इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पिछले 54 करोड़ वर्षों में पृथ्वी की टेक्टोनिक गतिविधियों और वैश्विक जलवायु के बीच संबंधों का विश्लेषण किया है। अध्ययन में बताया गया है कि पृथ्वी के कार्बन चक्र को समझने के लिए केवल ज्वालामुखीय क्षेत्रों पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। जहां टेक्टोनिक प्लेटें आपस में मिलती हैं, वहां ज्वालामुखियों की श्रृंखलाएं बनती हैं, जिनसे चट्टानों में लंबे समय से फंसा कार्बन बाहर निकलकर वातावरण में पहुंचता है। अब तक माना जाता रहा कि यही ज्वालामुखीय क्षेत्र वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड का मुख्य स्रोत हैं। हालांकि, नए निष्कर्ष इस धारणा को चुनौती देते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, मध्य-महासागरीय गड्ढे और महाद्वीपीय दरारें, जहां प्लेटें अलग होती हैं, भूवैज्ञानिक समय में पृथ्वी के कार्बन चक्र को संचालित करने में कहीं अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही हैं। महासागर वायुमंडल से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर उसे समुद्र तल पर कार्बन-समृद्ध चट्टानों में जमा कर लेते हैं। हजारों वर्षों में समुद्र तल पर सैकड़ों मीटर मोटी कार्बनयुक्त तलछट बन सकती है।

डीप कार्बन साइकिल की प्रक्रिया

टेक्टोनिक प्लेटों की गति के साथ ये चट्टानें आगे चलकर ‘सबडक्शन जोन’ तक पहुंचती हैं, जहां प्लेटें टकराती हैं और वहां से कार्बन डाइऑक्साइड को दोबारा वातावरण में छोड़ दिया जाता है। इस प्रक्रिया को ‘डीप कार्बन साइकिल’ कहा जाता है। कंप्यूटर मॉडल की मदद से वैज्ञानिकों ने यह अनुमान लगाया कि टेक्टोनिक प्लेटों पर मौजूद कार्बन कैसे पृथ्वी के भीतर, महासागरों और वायुमंडल के बीच घूमता रहा है। इससे वे पिछले 54 करोड़ वर्षों में प्रमुख ग्रीनहाउस और आइसहाउस जलवायु अवस्थाओं का अनुमान लगाने में सफल रहे।

अध्ययन के अनुसार, ग्रीनहाउस काल के दौरान वातावरण में कार्बन का उत्सर्जन अधिक रहा, जबकि आइसहाउस दौर में महासागरों द्वारा कार्बन का अवशोषण हावी रहा, जिससे वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर घटा और ठंड बढ़ी। शोध में यह भी रेखांकित किया गया कि गहरे समुद्र की तलछट वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाती है। शोधकर्ताओं ने बताया कि ज्वालामुखीय क्षेत्रों से निकलने वाला कार्बन पिछले लगभग 12 करोड़ वर्षों में ही प्रमुख स्रोत बना है। इसका कारण समुद्र में पाए जाने वाले सूक्ष्म जीव ‘प्लैंक्टिक कैल्सीफायर्स’ हैं, जो घुले हुए कार्बन को कैल्साइट में बदलकर समुद्र तल पर जमा करते हैं। ये जीव करीब 20 करोड़ वर्ष पहले विकसित हुए और लगभग 15 करोड़ वर्ष पहले महासागरों में व्यापक रूप से फैल गए।

पहले दरारें थीं ज्यादा प्रभावी

अध्ययन के अनुसार, इससे पहले के दौर में, मध्य-महासागरीय रिज और महाद्वीपीय दरारों से निकलने वाला कार्बन वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड का अधिक महत्वपूर्ण स्रोत था। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अध्ययन पृथ्वी की जलवायु को समझने का एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। जलवायु केवल वायुमंडलीय कार्बन से संचालित नहीं होती, बल्कि पृथ्वी की सतह से निकलने वाले कार्बन और समुद्र तल पर उसके जमा होने के बीच संतुलन से प्रभावित होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, टेक्टोनिक प्लेटों की इस दीर्घकालिक भूमिका को समझना भविष्य के जलवायु मॉडलों के लिए अहम है, खासकर ऐसे समय में जब मानव गतिविधियों के कारण कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर तेजी से बढ़ रहा है। पृथ्वी के प्राकृतिक कार्बन चक्र की यह समझ भविष्य की जलवायु स्थितियों का बेहतर अनुमान लगाने में मदद कर सकती है।

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