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ILO-NCAER की रिपोर्ट

भारत में बैंक खाते खुलवाने में महिलाएं पुरुषों से आगे, डिजिटल फाइनेंशियल सेवाओं में अब भी पुरुषों से पीछे

भारत में महिलाओं के बैंक खाते 2024 में 89% तक पहुंचे, लेकिन डिजिटल बैंकिंग और मोबाइल मनी के इस्तेमाल में वे पुरुषों से काफी पीछे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में यह अंतर और बड़ा है।

भारत में बैंक खाते खुलवाने में महिलाएं पुरुषों से आगे डिजिटल फाइनेंशियल सेवाओं में अब भी पुरुषों से पीछे

Women Close Bank Account Gap, But Lag in Digital Financial Services |

नई दिल्ली (भारत)। भारत में महिलाओं के नाम बैंक खाते होने के मामले में जेंडर गैप लगभग खत्म होने की तस्वीर सामने आई है, लेकिन डिजिटल फाइनेंशियल सेवाओं के इस्तेमाल में महिलाएं अब भी पुरुषों से काफी पीछे हैं। ILO (इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन) और NCAER (नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च) की संयुक्त पॉलिसी ब्रीफ के मुताबिक, 2024 में करीब 89 प्रतिशत महिलाओं के पास बैंक खाते थे, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा करीब 88 प्रतिशत रहा। हालांकि, ऑनलाइन बैंकिंग, मोबाइल मनी और अन्य डिजिटल वित्तीय सेवाओं के इस्तेमाल में महिलाओं की भागीदारी काफी कम है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में यह डिजिटल खाई और गहरी दिखाई देती है।

10 साल में महिलाओं के बैंक खातों का मालिकाना हक 43% से बढ़कर 89% हुआ

'एडवांसिंग विमेंस डिजिटल फाइनेंशियल इनक्लूजन इन द प्लेटफाॅर्म इकोनॉमी' (प्लेटफाॅर्म इकोनॉमी में महिलाओं के डिजिटल फाइनेंशियल समावेशन को बढ़ावा देना) नाम की इस पॉलिसी ब्रीफ में कहा गया है कि भारत में महिलाओं के बैंक खातों का मालिकाना हक 2014 में लगभग 43 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में लगभग 89 प्रतिशत हो गया। पुरुषों के मामले में, 2014 में यह आंकड़ा लगभग 62 प्रतिशत था, जो 2024 में बढ़कर लगभग 88 प्रतिशत हो गया।

बैंक खातों में बराबरी के बावजूद डिजिटल वित्तीय सेवाओं में महिलाएं पीछे

हालांकि, रिपोर्ट में कहा गया है कि पारंपरिक बैंक खातों तक पहुंच में हुई इस प्रगति के मुकाबले महिलाएं डिजिटल फाइनेंशियल सेवाओं का स्वतंत्र रूप से इस्तेमाल करने में उतनी आगे नहीं बढ़ पाई हैं। पॉलिसी ब्रीफ में कहा गया, "पारंपरिक बैंक खातों के मालिकाना हक में जेंडर समानता (स्त्री-पुरुष के बीच बराबरी) के करीब पहुंचने में भारत को जो सफलता मिली है। वैसी सफलता डिजिटल माध्यम से मिलने वाली फाइनेंशियल सेवाओं में अभी तक नहीं मिल पाई है।"

ऑनलाइन बैंकिंग में पुरुषों से 22 प्रतिशत अंक पीछे महिलाएं

कॉम्प्रिहेंसिव एनुअल मॉड्यूलर सर्वे 2022-23 के आंकड़ों से पता चला है कि 15 साल और उससे अधिक उम्र की केवल 25.2 प्रतिशत महिलाएं ही ऑनलाइन बैंकिंग ट्रांजैक्शन कर सकती थीं, जबकि पुरुषों के मामले में यह आंकड़ा 47.1 प्रतिशत था। यानी दोनों के बीच लगभग 22 प्रतिशत अंकों का अंतर था।

ग्रामीण महिलाओं में डिजिटल बैंकिंग का अंतर और गहरा

ग्रामीण भारत में यह अंतर और भी ज्यादा था, जहां केवल 17.1 प्रतिशत महिलाएं ही ऑनलाइन बैंकिंग कर सकती थीं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 39.2 प्रतिशत था। इंटरनेट पर सर्च करने, ईमेल का इस्तेमाल करने और ऑनलाइन बैंकिंग करने की क्षमता को मिलाकर देखें तो केवल 18 प्रतिशत महिलाओं में ये तीनों स्किल्स (कौशल) थीं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 30.1 प्रतिशत था।

मोबाइल मनी अकाउंट में महिलाओं की हिस्सेदारी सिर्फ 14 प्रतिशत

रिपोर्ट में मोबाइल मनी के इस्तेमाल में भी बड़े अंतर को उजागर किया गया है। 2024 में, भारत में 32 प्रतिशत पुरुषों के पास मोबाइल मनी अकाउंट था, जबकि महिलाओं के मामले में यह आंकड़ा सिर्फ 14 प्रतिशत था। इस तरह, जेंडर गैप (लिंग-आधारित अंतर) 18 प्रतिशत अंक का रहा। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह अंतर वैश्विक स्तर पर मौजूद छह प्रतिशत अंक के जेंडर गैप से तीन गुना ज्यादा है।

प्लेटफाॅर्म इकॉनमी बढ़ने के साथ डिजिटल खाई बनी बड़ी चुनौती

भारत में प्लेटफाॅर्म इकॉनमी के विस्तार के साथ यह अंतर महत्वपूर्ण हो जाता है। इकॉनमिक सर्वे और नीति आयोग के अनुमानों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में प्लेटफाॅर्म वर्कर्स की संख्या, जो 2020 में 77 लाख (7.7 मिलियन) थी, वित्त वर्ष 2025 तक 1.2 करोड़ (12 मिलियन) तक पहुँच गई और 2029-30 तक इसके 2.35 करोड़ (23.5 मिलियन) तक पहुँचने का अनुमान है।

कौशल, सुरक्षा और वित्तीय सेवाओं की कमी महिलाओं की राह में बाधा

पॉलिसी ब्रीफ में कहा गया है कि कई बाधाओं के कारण प्लेटफाॅर्म इकॉनमी में महिलाओं की भागीदारी कम है। इन बाधाओं में कौशल और डिजिटल साक्षरता में कमी, आने-जाने और सुरक्षा से जुड़ी चिंताएँ, सामाजिक पाबंदियाँ और वित्तीय सेवाओं तक सीमित पहुँच शामिल हैं। इसमें कहा गया है कि वित्तीय समावेशन का दायरा सिर्फ़ बैंक अकाउंट खोलने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि महिलाओं को पेमेंट, बचत, क्रेडिट और इंश्योरेंस जैसे उत्पादों का स्वतंत्र और टिकाऊ ढंग से इस्तेमाल करने में सक्षम बनाना चाहिए। (Source: ANI)

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