प्राइम न्यूज़ – एक कसम, राष्ट्र प्रथम
Breaking News

भगवान जगन्नाथ का स्नान उत्सव

देव स्नान पूर्णिमा 2026: भगवान जगन्नाथ का स्नान उत्सव और प्राकट्य दिवस आज

देव स्नान पूर्णिमा के पावन अवसर पर आज भगवान जगन्नाथ का दिव्य स्नान उत्सव मनाया जाएगा। इस दिन को उनके प्राकट्य दिवस के रूप में भी श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है।

देव स्नान पूर्णिमा 2026 भगवान जगन्नाथ का स्नान उत्सव और प्राकट्य दिवस आज

आज देव स्नान पूर्णिमा पर भगवान जगन्नाथ का पावन अभिषेक |

जगन्नाथ पुरी, ओडिशा। देव स्नान पूर्णिमा, जिसे स्नान पुर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू कैलेंडर के अनुसार ज्येष्ठ महीने की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। यह पर्व विशेष रूप से श्री जगन्नाथ मंदिर (पुरी, ओडिशा)  में अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह दिन भगवान जगन्नाथ के प्राकट्य दिवस (जन्मदिन) के रूप में भी माना जाता है।

स्नान पूर्णिमा के मुख्य आकर्षण और रीति-रिवाज

इस दिन मंदिर के गर्भगृह से भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की मूर्तियों को एक भव्य पहांडी के माध्यम से स्नान बेदी तक लाया जाता है।  यहाँ देवताओं को 108 स्वर्ण कलशों में रखे गए सुगंधित, जड़ी-बूटियों और पवित्र जल से स्नान कराया जाता है। स्नान के बाद, देवताओं को विशेष 'गजानन वेश'  से सजाया जाता है, जिसमें भगवान जगन्नाथ को भगवान गणेश के रूप में अलंकृत किया जाता है। इस रूप का दर्शन करने के लिए देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु पुरी में एकत्रित होते हैं।

स्नान का शुभ मुहूर्त

भगवान जगन्नाथ के मुख्य स्नान का समय ब्रम्ह मुहूर्त में सुबह 04ः06 बजे से 04ः46 बजे तक का था। उनके महास्नान 'जल बिजे' का मुहूर्त सुबह 09ः30 से 11ः30 तक की है।

15 दिनों का 'अनासारा' काल

हिंदू मान्यताओं के अनुसार, भव्य स्नान के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा बीमार पड़ जाएंगें।  बुखार के कारण, वे अगले 15 दिनों के लिए एकांतवास में चले जाएंगें। इस अवधि को 'अनासारा' या 'अनवसर' काल कहा जाता है। इन 15 दिनों तक भक्त मुख्य मूर्तियों के दर्शन नहीं कर पाएंगे। इस बीमारी की अवधि के दौरान, देवताओं को पारंपरिक वैद्य के रूप में जड़ी-बूटियों और फलों के रस से बने काढ़े का लेप लगाया जाएगा। इस समय में भक्त मुख्य मूर्तियों की जगह मंदिर में सुंदर पट्टचित्र की पूजा करते हैं।

16वें दिन होगा "नेत्रोत्सव"

15 दिनों के पूर्ण विश्राम और उपचार के बाद, 16वें दिन देवता ठीक होकर 'नेत्रोत्सव' पर पुनः भक्तों को दर्शन देंगे। नेत्रोत्सव के दौरान भगवान का श्रृंगार पुरी के राजा की तरह किया जाएगा।

पौराणिक महत्व और इतिहास

स्कंद पुराण के अनुसार, देवस्नान पूर्णिमा का इतिहास बहुत प्राचीन है। राजा इंद्रद्युम्न ने जब पहली बार इन पवित्र देवदारू की मूर्तियों की स्थापना की थी, तब इस स्नान समारोह की शुरुआत की गई थी। यह भी मान्यता है, कि जो भक्त इस पावन दिन पर भगवान जगन्नाथ के स्नान रूप का दर्शन करते हैं, उनके सारे पाप धुल जाते हैं और उन्हें पुण्य की प्राप्ति होती है।

विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा की शुरुआत

देव स्नान पूर्णिमा के दिन से ही जगन्नाथ रथ यात्रा के मुख्य उत्सवों की शुरुआत हो जाती है। एकांतवाश के समापन के ठीक बाद जगन्नाथ रथ यात्रा आयोजित की जाती है, जिसमें भगवान अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं और गुंडीचा मंदिर जाते हैं। यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह ईश्वर और भक्त के बीच के मानवीय प्रेम और जुड़ाव का प्रतीक है।

यह भी पढ़ेंः ज्येष्ठ पूर्णिमा 2026: जानिए इस पवित्र तिथि का महत्व, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Related to this topic: