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चातुर्मास का शुभारंभ

हरिशयनी एकादशी 2026: आत्मचिंतन, संयम और आत्मपरिष्कार का संदेश देता है चातुर्मास

हरिशयनी एकादशी से प्रारंभ होने वाला चातुर्मास आत्मचिंतन, संयम, साधना और सकारात्मक जीवनशैली अपनाने की प्रेरणा देता है।

हरिशयनी एकादशी 2026 आत्मचिंतन संयम और आत्मपरिष्कार का संदेश देता है चातुर्मास

Hari Shayani Ekadashi 2026 |

नई दिल्ली,(भारत)। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की हरिशयनी एकादशी, जिसे देवशयनी एकादशी भी कहा जाता है, से चातुर्मास का शुभारंभ माना जाता है। सनातन परंपरा के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं और कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवोत्थान एकादशी के दिन पुनः जागृत होते हैं। इन चार महीनों को साधना, संयम, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक उन्नति का विशेष काल माना गया है।

दिव्य चेतना और आंतरिक स्थिरता की प्रतीकः योगनिद्रा

धार्मिक मान्यताओं में भगवान विष्णु की योगनिद्रा को सामान्य निद्रा नहीं, बल्कि दिव्य चेतना और आंतरिक स्थिरता का प्रतीक माना गया है। मान्यता है, कि योगनिद्रा आदिशक्ति की ही एक भिन्न स्वरूप हैं, जो स्वंय श्री नारायण को भी अपने वशीभूत कर लेती हैं और चार महीने के लिए गहरी निंद्रा मे सो जाते हैं। इस समयावधि में अलग-अलग देवता संपूर्ण सृष्टि का पालन करते हैं।

चातुर्मास का भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व

चातुर्मास की परंपरा भारतीय संस्कृति में विशेष महत्व रखती है। प्राचीन समय में वर्षा ऋतु के दौरान यात्रा कठिन होने के कारण साधु-संत एक स्थान पर रहकर तप, स्वाध्याय, योग, ध्यान, कथा, भजन और धार्मिक प्रवचनों के माध्यम से समाज में नैतिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों का प्रसार करते थे। यह परंपरा आज भी आध्यात्मिक जीवन को मजबूत करने का माध्यम बनी हुई है। चातुर्मास में भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं, इसलिए इस दौरान नियम और संयम का पालन करना चाहिए, सात्विक भोजन करना चाहिए और विष्णु-भक्ति करनी चाहिए।

इस अवधि में क्या करना चाहिए?

पूजा-पाठ:
प्रतिदिन भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और तुलसी जी की पूजा करें तथा "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप करें।
दान-पुण्य:
गरीबों और जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र व पीला अनाज दान करें।
धार्मिक पठन:
गीता, विष्णु सहस्रनाम या श्रीमद्भागवत कथा का नियमित पाठ करें।
संयम:
ब्रह्मचर्य का पालन करें और सादा जीवन जिएं।

क्या नहीं करना चाहिए?

मांगलिक कार्य:
विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और नए व्यापार की शुरुआत जैसे शुभ कार्य वर्जित होते हैं।
खान-पान के नियम:
प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा और तामसिक भोजन का त्याग करें।
विशेष वर्जित वस्तुएं:
मास अनुसार त्याग का नियम माना जाता है जैसे सावन में हरी सब्जियां, भाद्रपद में दही, आश्विन में दूध और कार्तिक में दाल-तेल का परहेज किया जाता है।

(Disclaimer:- Prime News इस लेख की पुष्टी नही करता, यह लेख धार्मिक मान्यताओं एवं उपलब्ध धार्मिक स्रोतों पर आधारित है।)

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