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मधुश्रावणी पर्व परंपरा और महत्व

मिथिला की नवविवाहिताओं के लिए खास है 14 दिवसीय मधुश्रावणी पर्व

मिथिलांचल की समृद्ध लोक-सांस्कृतिक पर्वों में मधुश्रावणी पर्व का विशेष स्थान है।

मिथिला की नवविवाहिताओं के लिए खास है 14 दिवसीय मधुश्रावणी पर्व

Madhushravani: A Special 14-Day Festival for Newlywed Women of Mithila | AI Image

नई दिल्ली (भारत)। मिथिलांचल की समृद्ध लोक-संस्कृति में मधुश्रावणी पर्व का विशेष स्थान है। सावन महीने में मनाया जाने वाला यह पर्व नवविवाहित महिलाओं से जुड़ा है। बिहार के मिथिला क्षेत्र के साथ नेपाल के तराई वाले मिथिला अंचल में भी मधुश्रावणी की परंपरा देखने को मिलती है। यह पर्व धार्मिक आस्था के साथ-साथ मिथिला के लोकगीत, लोककथाओं और पारंपरिक रीति-रिवाजों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने का माध्यम भी है।

14 दिनों तक चलती है पूजा

मधुश्रावणी का पर्व सामान्यतः 14 दिनों तक चलता है। यह पर्व श्रावण कृष्ण-पक्ष की पंचमी 'मौना पंचमी' से आरंभ होकर श्रावण शुक्ल-पक्ष की तृतीय 'मधुश्रावणी' तक चलता है।  विवाह के बाद पहली बार सावन में मायके आई नवविवाहिता इस पर्व में प्रमुख रूप से पूजा-अनुष्ठान करती है। सुबह स्नान के बाद पारंपरिक विधि से नाग देवी विषहरा की पूजा की जाती है। इस पूजा के लिए एक दिन पहले शाम को फूल-पत्तियां और विभिन्न प्रकार की वनस्पतियां एकत्र किया जाता है। जिसके लिए नवविवाहिताऐं शाम के समय अपनी सहेलियों के साथ अपने आस-पास के पर्यटक एवं धार्मिक स्थानों पर जाकर फूल इकट्ठा करती हैं। इसे फूललोढ़ी के नाम से जाना जाता है। अगले दिन उसी बासी फूल से विषहरा की पूजा की जाती है।

रोजाना पूजा के साथ विभिन्न पौराणिक और लोककथाएं सुनती हैं महिलायें

मधुश्रावणी पर्व पूरी तरह से महिलाओं का पर्व है। इस पर्व मे पूजा करवाने वाली भी स्त्री ही होती है। नवविवाहिता के पति केवल पूजा के समय साथ बैठते हैं। इस पर्व के दौरान नवविवाहिता को रोजाना पूजा के साथ विभिन्न पौराणिक और लोककथाएं सुनाई जाती हैं। इस कथाओं को 'दंतकथा' कहते हैं। इन कथाओं में भगवान शिव-पार्वती, नाग-नागिन, पतिव्रता स्त्रियाँ और अन्य देवी-देवताओं से जुड़ी कथाएं कही जाती हैं।

शिव-पार्वती और नाग देवता की पूजा

मधुश्रावणी में नाग देवी विषहरा की पूजा प्रमुख रूप से की जाती है। इसके साथ महादेव-पार्वती और अन्य नाग-नागिन की पूजा भी परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस पर्व के माध्यम से नवविवाहिता अपने वैवाहिक जीवन की सुख-शांति, पति की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य की कामना करती है।

लोकगीतों के बिना अधूरा है मधुश्रावणी

मधुश्रावणी की सबसे खास पहचान इसके पारंपरिक लोकगीत हैं। पूजा के दौरान महिलाएं सामूहिक रूप से गीत गाती हैं। इन गीतों में सबसे प्रमुख रूप से नाग देवी विषहरा के गीत होते हैं, इसके साथ कोहबर, मायका, ससुराल, पति-पत्नी के रिश्ते, ननद-भाभी के नोक-झोंक और देवी-देवताओं से जुड़ी लोकगीत भी गए जाते हैं। इन गीतों के जरिए महिलाएं नई पीढ़ी को मिथिला की परंपराओं और लोककथाओं से परिचित कराती हैं। इस तरह मधुश्रावणी केवल पूजा का पर्व नहीं, बल्कि मौखिक लोक-साहित्य को जीवित रखने का माध्यम भी है।

हरियाली, वर्षा, झूले और लोकगीतों का महीना

फूललोढ़ी के दौरान महिलायें गीतों के माध्यम से अपने वेवहिक जीवन के प्रेम और तकरार जैसी भावनाओं को अपनी सहेलियों से व्यक्त करती हैं। महिलायें 16 श्रृंगार करती हैं और बगीचों मे झूला झूलती हैं। साथ ही हरी साग सब्जी और दिन मे नमक नहीं खाती हैं।भारतीय संस्कृति में सावन वैसे भी हरियाली, वर्षा, झूले और लोकगीतों का महीना माना जाता है। ऐसे में मधुश्रावणी इस मौसम की सांस्कृतिक रंगत को और गहरा कर देती है। इससे पर्व में प्रकृति और लोकजीवन का जुड़ाव भी दिखाई देता है।

अंतिम दिन होती है विशेष रस्म

मधुश्रावणी के अंतिम दिन कई परिवारों में विशेष पूजा और परंपरागत रस्में निभाई जाती हैं। इनमें 'टेमी दागने' की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है। इसमें नवविवाहिता के पैरों पर जलते दीपक की लौ से प्रतीकात्मक निशान बनाने की रस्म की जाती है।

मायके और ससुराल के रिश्तों को जोड़ता है पर्व

मधुश्रावणी नवविवाहिता के लिए मायके से जुड़ाव का भी खास अवसर होता है। विवाह के बाद पहली बार सावन में मायके आने वाली बेटी के लिए परिवार में विशेष उत्साह रहता है। रिश्तेदार और परिवार की महिलाएं उसके साथ पूजा-अनुष्ठान में शामिल होती हैं। इस पर्व के दौरान नवविवाहिता के लिए खाने, पहनने और श्रृंगार का सारा समान उसके ससुराल से भेजा जाता है। 

आज भी कायम है परंपरा

आधुनिक समय में जीवनशैली में काफी बदलाव आया है, लेकिन मिथिलांचल के परिवारों में मधुश्रावणी की परंपरा आज भी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों ने मधुश्रावणी के लोकगीतों और परंपराओं को मिथिला से बाहर रहने वाले लोगों तक पहुंचाने में भी भूमिका निभाई है। मधुश्रावणी इस बात का उदाहरण है, कि लोकपर्व केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं होते, बल्कि वे समाज की स्मृतियों, रिश्तों, गीतों, कथाओं और सांस्कृतिक पहचान को भी पीढ़ियों तक जीवित रखते हैं।

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