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अनोखी रसोई का रहस्य

जगन्नाथ मंदिर की अलौकिक रसोई: जहाँ कभी नहीं घटता महाप्रसाद

पुरी स्थित जगन्नाथ जी की रसोई अपनी अनोखी परंपरा और महाप्रसाद की निरंतर उपलब्धता के कारण प्रसिद्ध है।

जगन्नाथ मंदिर की अलौकिक रसोई जहाँ कभी नहीं घटता महाप्रसाद

Mystical Kitchen of Jagannath Temple: Mahaprasad Never Falls Short |

पुरी (ओडिशा)। के पवित्र धाम पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर अपने भव्य स्वरूप के साथ-साथ अपनी चमत्कारी और विशाल रसोई के लिए भी दुनिया भर में प्रसिद्ध है। इस दिव्य रसोई को दुनिया की सबसे बड़ी रसोई माना जाता है, जहाँ हर दिन आस्था और विज्ञान का एक अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

प्रसाद पकाने का अनोखा तरीका

इस रसोई में पकाया जाने वाला महाप्रसाद भक्तों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है। रसोई की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ का प्रसाद पकाने का तरीका बेहद अनोखा है। यहाँ भोजन तैयार करने के लिए सात मिट्टी के बर्तनों (हांडियों) को एक के ऊपर एक क्रम में रखकर लकड़ी की आग पर पकाया जाता है।

इस प्रक्रिया के रहस्य को सुलझाने में विज्ञान भी नाकाम

विज्ञान के नियमों को चुनौती देता सबसे बड़ा रहस्य यह है कि सबसे नीचे आग होने के बावजूद, सबसे ऊपर रखी सातवीं हांडी का खाना सबसे पहले पकता है, और फिर क्रमशः नीचे की हांडियां पकती हैं। विज्ञान भी इस प्रक्रिया के रहस्य को सुलझाने में नाकाम रहा है।

आम की लकड़ी और मंदिर के पवित्र कुओं के पानी का उपयोग

इस विशाल रसोई में भोजन पकाने के लिए किसी गैस या बिजली का उपयोग नहीं होता। केवल आम की लकड़ी और मंदिर के पवित्र कुओं के पानी का ही इस्तेमाल किया जाता है। साथ ही, यहाँ की पवित्रता का स्तर इतना ऊंचा है कि रसोई के अंदर प्याज, लहसुन या टमाटर का उपयोग पूरी तरह वर्जित है और 100% सात्विक भोजन ही बनता है।

56 भोग और महाप्रसाद का रहस्य

भगवान जगन्नाथ को प्रतिदिन 56 प्रकार के दिव्य भोग अर्पित किए जाते हैं। इनमें मीठा चावल (कनिका), मीठी दाल (मीठा डाली), सब्जी (महुर), और खस्ता खाजा मिठाई भक्तों के बीच विशेष रूप से लोकप्रिय हैं। इन व्यंजनों को तैयार करने के बाद सबसे पहले माँ विमला देवी को भोग लगाया जाता है। इसके बाद यह भोग भगवान जगन्नाथ को चढ़ाया जाता है, और इसी धार्मिक प्रक्रिया के बाद यह सामान्य भोजन से अलौकिक 'महाप्रसाद' में बदल जाता है।

लाखों भक्तों का पेट भरता है यह प्रसाद

इस विशाल रसोई में हर दिन सामान्य दिनों में 20,000 से 50,000 भक्तों के लिए महाप्रसाद तैयार किया जाता है। वहीं, वार्षिक रथ यात्रा जैसे उत्सवों के दौरान यहाँ रोज़ाना 1 लाख से अधिक लोगों का खाना तैयार होता है। इस रसोई का सबसे बड़ा चमत्कार यह है, कि यहाँ आने वाले भक्तों की संख्या चाहे जितनी हो, महाप्रसाद कभी कम नहीं पड़ता। इसके साथ ही, दिन के अंत में भोजन का एक दाना भी बर्बाद नहीं होता।

स्वयं माँ लक्ष्मी करती हैं इस रसोई की देखरेख

पौराणिक मान्यता है कि स्वयं माँ लक्ष्मी इस रसोई की देखरेख करती हैं, जिसके प्रभाव से यह महाप्रसाद कभी खत्म नहीं होता और इसे ग्रहण करने वाले हर भक्त की मनोकामना पूरी होती है।

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