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आज मनाया जाएगा कुशी अमावस्या

कुशी अमावस्या 2026: मिथिला में आज के दिन क्यों उखाड़ी जाती है कुश? जानें धार्मिक महत्व और पूजा विधि

आज पूरे भारत में कुशी अमावस्या का पर्व मनाया जा रहा है। आज के दिन भारत के कई हिस्सों में पूरे साल के विभिन्न पर्वों में पूजा के लिए कुश उखाड़ी जाती है।

कुशी अमावस्या 2026 मिथिला में आज के दिन क्यों उखाड़ी जाती है कुश जानें धार्मिक महत्व और पूजा विधि

कुश उखाड़ते हुए लोग |

नई दिल्ली (भारत)। मिथिला सहित देश के कई हिस्सों में भाद्रपद मास की अमावस्या का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। मिथिला क्षेत्र में इसे कुशी अमावस्या के नाम से जाना जाता है, जबकि अन्य स्थानों पर इसे कुशोत्पाटिनी अमावस्या, कुशाग्रहणी अमावस्या या भाद्रपद अमावस्या कहा जाता है। इस दिन पवित्र कुश यानी दर्भा घास को विधि-विधान से ग्रहण करने की परंपरा है। माना जाता है कि इसी कुश का इस्तेमाल वर्षभर पूजा-पाठ, श्राद्ध, तर्पण और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है।

2026 में कब है कुशी अमावस्या?

पंचांग गणना के अनुसार 2026 में भाद्रपद अमावस्या की तिथि 10 सितंबर से शुरू होकर 11 सितंबर तक रहने की जानकारी विभिन्न पंचांग स्रोतों में दी गई है। उदया तिथि के आधार पर कई स्थानों पर 11 सितंबर 2026, शुक्रवार को कुशोत्पाटिनी अमावस्या माना जा रहा है। हालांकि स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा और कुश ग्रहण का समय अलग हो सकता है।

आखिर क्यों महत्वपूर्ण है कुश?

सनातन परंपरा में कुश को सामान्य घास नहीं बल्कि पवित्र वनस्पति माना गया है। वैदिक और धार्मिक कर्मकांडों में कुश का इस्तेमाल लंबे समय से होता आया है। पूजा के दौरान कुश से बनी पवित्री धारण करने, आसन बनाने, तर्पण और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में इसका प्रयोग किया जाता है। इसी वजह से भाद्रपद अमावस्या पर पूरे वर्ष के लिए कुश को विधिपूर्वक ग्रहण करने की परंपरा है। इसी कारण इस अमावस्या को कुशोत्पाटिनी या कुशाग्रहणी अमावस्या कहा जाता है।

कुशी अमावस्या पर क्या करें?

इस दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनने की परंपरा है। इसके बाद भगवान का ध्यान करके घर में पूजा-पाठ किया जाता है। श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र, तिल या अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान भी करते हैं। अमावस्या होने के कारण पूर्वजों के स्मरण और तर्पण को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। पितरों के लिए जल और तिल से तर्पण करने तथा उनका स्मरण करने की परंपरा कई परिवारों में निभाई जाती है।

ऐसे ग्रहण करें कुश

धार्मिक परंपरा के अनुसार कुश को बिना नियम के कहीं से भी उखाड़ने के बजाय विधिपूर्वक ग्रहण किया जाता है। कुश को साफ स्थान से लेना और पूजा योग्य कुश को सुरक्षित रखना उचित माना जाता है। कुश ग्रहण करते समय कई परंपराओं में विशेष मंत्रों का उच्चारण करने का विधान भी मिलता है। अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में इसकी विधि अलग हो सकती है, इसलिए परिवार या स्थानीय पुरोहित द्वारा बताई गई विधि का पालन किया जा सकता है।

पूरे साल कहां काम आती है कुश?

कुश का उपयोग विभिन्न धार्मिक कर्मों में किया जाता है। श्राद्ध और तर्पण, यज्ञ, हवन, पूजा, संकल्प और वैदिक कर्मकांडों में कुश का इस्तेमाल किया जाता है। पितृ पक्ष के दौरान होने वाले कई कर्मों में भी कुश का प्रयोग किया जाता है। यही वजह है कि कुशी अमावस्या को आने वाले धार्मिक कार्यों की तैयारी से जोड़कर भी देखा जाता है।

पितृ पक्ष से भी है संबंध

भाद्रपद पूर्णिमा के बाद पितृ पक्ष की शुरुआत होने के कारण इस अमावस्या को पूर्वजों के स्मरण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना, तर्पण करना और जरूरतमंदों को दान देना धार्मिक परंपरा का हिस्सा है।

मिथिला में विशेष पहचान

मिथिला क्षेत्र में इस अमावस्या को कुशी अमावस्या के नाम से जाना जाता है। यहां कुश के धार्मिक महत्व के साथ-साथ इस दिन से जुड़ी पारंपरिक मान्यताएं आज भी लोगों के बीच प्रचलित हैं। विशेष रूप से कर्मकांड और पितृ कार्यों में इस्तेमाल होने वाली कुश को इस दिन एकत्र करने की परंपरा को महत्वपूर्ण माना जाता है।

क्या न करें?

अमावस्या के दिन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार घर में विवाद, अपशब्द और नकारात्मक व्यवहार से बचने की सलाह दी जाती है। नशे और तामसिक गतिविधियों से दूर रहकर सात्विक जीवनशैली अपनाने की परंपरा है। साथ ही कुश को बिना आवश्यकता या धार्मिक उद्देश्य के नुकसान पहुंचाने से बचना चाहिए। इसे श्रद्धा और आवश्यकता के अनुसार ही ग्रहण करना उचित माना जाता है।

धार्मिक मान्यता क्या कहती है?

कुशी अमावस्या केवल कुश घास एकत्र करने का दिन नहीं है, बल्कि इसे पितरों के स्मरण, दान, तर्पण और धार्मिक शुद्धता से जुड़ी महत्वपूर्ण तिथि माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन श्रद्धा से किए गए कर्मों का विशेष महत्व होता है।

नोट: कुशी अमावस्या से जुड़ी पूजा, कुश ग्रहण और तर्पण की विधि क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है। तिथि और मुहूर्त के लिए स्थानीय पंचांग को प्राथमिकता दें।

(Disclaimer: Prime News इस लेख की पुष्टि नहीं करता। यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं एवं उपलब्ध स्रोतों पर आधारित है।)

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