अफ्रीका में हुए अध्ययन के मुताबिक, एचआईवी पीड़ित किशोरों के लिए हर आठ सप्ताह में लगने वाला इंजेक्शन दैनिक गोलियों से ज्यादा असरदार साबित हुआ है।
वाशिंगटन: अफ्रीका में किए गए एक नैदानिक परीक्षण में पाया गया कि एचआईवी से पीड़ित किशोरों में हर आठ सप्ताह में दिए जाने वाले लंबे समय तक असर करने वाले इंजेक्शन से वायरस को दैनिक एंटीरेट्रोवायरल गोलियों की तुलना में बेहतर तरीके से नियंत्रित रखा जा सकता है। शोधकर्ताओं ने निम्न और मध्यम आय वाले देशों में इस उपचार की व्यापक उपलब्धता की मांग की है।
96 सप्ताह बाद इंजेक्शन समूह में कम वायरल रिबाउंड
यूरेका अलर्ट! द्वारा प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (UCL) के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किए गए परीक्षण में पाया गया कि एचआईवी से पीड़ित युवाओं ने हर आठ सप्ताह में दिए जाने वाले लंबे समय तक असर करने वाले इंजेक्शन के साथ दैनिक एंटीरेट्रोवायरल गोलियों की तुलना में बेहतर उपचार परिणाम हासिल किए। द लैंसेट में प्रकाशित निष्कर्षों के मुताबिक, इंजेक्शन से उपचार पाने वाले केवल 2 किशोरों (1 प्रतिशत) में 96 सप्ताह बाद वायरस के दोबारा बढ़ने की पुष्टि हुई। वहीं, दैनिक गोलियां लेने वाले समूह में यह संख्या 15 (6 प्रतिशत) थी।
चार अफ्रीकी देशों के 476 किशोर शामिल
लॉन्ग-एक्टिंग ट्रीटमेंट इन एडोलसेंट्स (LATA) परीक्षण में केन्या, दक्षिण अफ्रीका, युगांडा और जिम्बाब्वे के पांच क्लीनिकों से 12 से 19 वर्ष की आयु के 476 किशोर शामिल हुए। प्रतिभागियों को दो समूहों में बांटा गया। एक समूह को रोजाना ली जाने वाली मानक टैबलेट दवा दी गई, जबकि दूसरे समूह को कैबोटेग्राविर और रिल्पिविरिन जैसी लंबे समय तक असर करने वाली एचआईवी दवाओं के इंजेक्शन दिए गए। सभी प्रतिभागी एक साल से अधिक समय से टैबलेट ले रहे थे। उनका एचआईवी नियंत्रित था और पहले उनका कोई उपचार विफल नहीं हुआ था। इनमें से लगभग सभी को जन्म के समय एचआईवी संक्रमण हुआ था।
वायरल रिबाउंड क्या है?
वायरल रिबाउंड का मतलब है कि एचआईवी नियंत्रित होने के बाद रक्त में वायरस की मात्रा फिर से बढ़ने लगे। शोधकर्ताओं के अनुसार, वायरल लोड में बढ़ोतरी लंबे समय में स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है और कुछ मामलों में संक्रमण के जोखिम को भी बढ़ा सकती है। इंजेक्शन समूह के करीब 94 प्रतिशत प्रतिभागियों ने कहा कि हर आठ सप्ताह में उपचार लेना रोजाना दवा लेने की तुलना में काफी आसान था। UCL इनोवेटिव क्लिनिकल ट्रायल्स यूनिट की प्रोफेसर सारा पेट, जो LATA परीक्षण की मुख्य शोधकर्ता थीं, ने कहा कि एचआईवी से पीड़ित किशोरों का एंटीरेट्रोवायरल दवाओं पर वयस्कों की तुलना में ऐतिहासिक रूप से खराब प्रदर्शन रहा है। उन्होंने कहा कि रोजाना गोलियां लेने से जुड़ी परेशानी और कलंक के बीच हर दो महीने में दिया जाने वाला लंबे समय तक असर करने वाला इंजेक्शन युवाओं को अधिक सामान्य जीवन जीने में मदद कर सकता है।
अफ्रीका में उपचार की उपलब्धता बड़ी चुनौती
पेट ने कहा कि इन निष्कर्षों से किशोरों के लिए इंजेक्शन आधारित उपचार की व्यापक उपलब्धता का समर्थन मिलता है। उनके मुताबिक, एचआईवी से पीड़ित 10 में से 9 किशोर अफ्रीका में रहते हैं, लेकिन वर्तमान में यह उपचार उनके लिए आसानी से उपलब्ध नहीं है। दुनिया में करीब 10 से 19 वर्ष की आयु के 16 लाख किशोर एचआईवी से पीड़ित हैं। फिलहाल एचआईवी का कोई इलाज नहीं है, लेकिन एंटीरेट्रोवायरल उपचार लोगों को लंबा और स्वस्थ जीवन जीने में मदद कर सकता है और संक्रमण के जोखिम को काफी कम कर सकता है।
महंगी दवाएं और भंडारण की चुनौती
शोधकर्ताओं के अनुसार, अफ्रीका और अन्य कम संसाधन वाले क्षेत्रों में लंबे समय तक असर करने वाले इंजेक्शनों की उपलब्धता बढ़ाने में कई चुनौतियां हैं। पेटेंट के कारण ये दवाएं सामान्य गोलियों की तुलना में महंगी हैं और इनके निर्माण में भी अधिक लागत आती है। रिल्पिविरिन को आपूर्ति और भंडारण के दौरान रेफ्रिजरेटर में रखना जरूरी होता है। वहीं, हर आठ सप्ताह में इंजेक्शन देने के लिए प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ की आवश्यकता होती है। इसके मुकाबले रोजाना गोलियां लेने वाले लोगों को उपचार के लिए हर तीन या छह महीने में ही अपॉइंटमेंट की जरूरत पड़ सकती है। फिलहाल इंजेक्शन के जेनेरिक संस्करण को लेकर भी कोई सहमति नहीं है।
अमेरिका और यूरोप में उपलब्ध, अफ्रीका में सीमित
अमेरिका, यूरोप और अन्य उच्च आय वाले देशों में ये इंजेक्शन फिलहाल 12 वर्ष और उससे अधिक उम्र के किशोरों और वयस्कों को दिए जा सकते हैं। हालांकि, अफ्रीका में कुछ चुनिंदा क्लीनिकों को छोड़कर ये उपचार उपलब्ध नहीं हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन वर्तमान में उन वयस्कों और किशोरों के लिए लंबे समय तक असर करने वाले इंजेक्शनों को एक “वैकल्पिक” विकल्प के रूप में सुझाता है, जो रोजाना गोलियां ले रहे हैं, एचआईवी को सफलतापूर्वक नियंत्रित कर चुके हैं और जिन्हें सक्रिय हेपेटाइटिस बी नहीं है।
विशेषज्ञों ने एचआईवी उपचार में असमानता पर जताई चिंता
UCL इनोवेटिव क्लिनिकल ट्रायल्स यूनिट की डॉ. डेबोरा फोर्ड ने कहा कि अफ्रीका में इंजेक्शन आधारित उपचार की अनुपलब्धता एचआईवी देखभाल में असमानता को और बढ़ा सकती है। उन्होंने कहा कि इससे एचआईवी से पीड़ित अधिकांश लोग उन उपचारों से वंचित रह सकते हैं, जो उच्च आय वाले देशों में उपलब्ध हैं। उनके मुताबिक, भविष्य में साल में केवल दो बार दिए जाने वाले दूसरी और तीसरी पीढ़ी के इंजेक्शनों के परीक्षण के साथ यह अंतर और बढ़ सकता है।
'किशोरों ने इंजेक्शन को प्राथमिकता दी'
हरारे साइट की प्रमुख शोधकर्ता और परीक्षण चिकित्सक डॉ. मुत्सा बवाकुरा-डांगारेम्बिज़ी ने कहा कि LATA परीक्षण में आठ सप्ताह के अंतराल पर दिए जाने वाले इंजेक्शन वायरस को पता न चलने योग्य स्तर पर रखने में अधिक प्रभावी रहे, उन्हें आसानी से सहन किया गया और किशोरों ने इन्हें प्राथमिकता दी। उन्होंने कहा कि अफ्रीका और अन्य निम्न एवं मध्यम आय वाले देशों में इन लंबे समय तक असर करने वाले इंजेक्शनों की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती है और इसका समाधान करना जरूरी है, ताकि इनका इस्तेमाल उन समूहों में किया जा सके जिन्हें इनकी सबसे अधिक जरूरत है।
यूरोपीय संघ ने किया परीक्षण का वित्त पोषण
इस परीक्षण को यूरोपीय संघ ने EDCTP-2 और जॉनसन एंड जॉनसन इनोवेटिव मेडिसिन्स के माध्यम से वित्त पोषित किया था। जॉनसन एंड जॉनसन इनोवेटिव मेडिसिन्स ने इंजेक्शन योग्य रिल्पिविरिन, जबकि ViiV हेल्थकेयर ने इंजेक्शन योग्य कैबोटेग्राविर उपलब्ध कराया। UCL इस अध्ययन का प्रायोजक था। केन्या, दक्षिण अफ्रीका, युगांडा और जिम्बाब्वे के शोधकर्ताओं ने परीक्षण में योगदान दिया। अध्ययन में लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन, राडबाउड यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर और यॉर्क विश्वविद्यालय के समाज विज्ञान, औषध विज्ञान और स्वास्थ्य अर्थशास्त्र के शोधकर्ता भी शामिल थे।
(एएनआई)
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