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IIT गुवाहाटी ने बनाया दिमाग जैसा डिवाइस

IIT गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने बनाया मस्तिष्क जैसा उपकरण, 500 गुना कम ऊर्जा में करेगा काम

IIT गुवाहाटी और खड़गपुर के शोधकर्ताओं ने मस्तिष्क से प्रेरित उपकरण बनाया, जो 500 गुना कम ऊर्जा में दृश्य जानकारी का विश्लेषण कर सकता है।

 iit गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने बनाया मस्तिष्क जैसा उपकरण 500 गुना कम ऊर्जा में करेगा काम

IIT Guwahati Develops Brain-Like Device |

गुवाहाटी: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने IIT खड़गपुर के सहयोग से एक ऐसा प्रकाश-संवेदनशील उपकरण विकसित किया है, जो बेहद कम ऊर्जा में दृश्य जानकारी को पहचानने, संग्रहित करने और उसका विश्लेषण करने में सक्षम है। मस्तिष्क की कार्यप्रणाली से प्रेरित यह तकनीक चेहरे की पहचान, रोबोटिक दृष्टि और स्मार्ट कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में उपयोगी साबित हो सकती है।

कैमरा, मेमोरी और प्रोसेसर के काम को एक साथ जोड़ने की कोशिश

आमतौर पर इलेक्ट्रॉनिक इमेज प्रोसेसिंग में कैमरा तस्वीर कैप्चर करता है, मेमोरी डेटा संग्रहित करती है और प्रोसेसर उसका विश्लेषण करता है। इन अलग-अलग घटकों के बीच डेटा का लगातार आदान-प्रदान होता है, जिससे ऊर्जा की खपत बढ़ती है। इसके विपरीत, मानव मस्तिष्क कम ऊर्जा खर्च करके जानकारी को महसूस करने, समझने, याद रखने और उससे सीखने का काम एक साथ करता है। इसी क्षमता से प्रेरित होकर वैज्ञानिक ऐसे उपकरण विकसित कर रहे हैं, जो मस्तिष्क की तरह काम कर सकें।

कृत्रिम सिनेप्स से मिलेगी मस्तिष्क जैसी क्षमता

शोध दल ने एक सूक्ष्म कृत्रिम सिनेप्स विकसित किया है, जो प्रकाश के प्रति प्रतिक्रिया देने के साथ प्रकाश बंद होने के बाद भी जानकारी को अपने भीतर बनाए रख सकता है। मस्तिष्क में सिनेप्स तंत्रिका कोशिकाओं के बीच संपर्क स्थापित करने और सूचनाओं के आदान-प्रदान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस तकनीक का उद्देश्य संवेदन, स्मृति और सूचना प्रसंस्करण को एक ही उपकरण में जोड़ना है। इससे दृश्य जानकारी को पहचानने के लिए हर बार पूरी प्रक्रिया नए सिरे से करने की जरूरत कम हो सकती है।

MXene और P3HT पदार्थों से तैयार किया उपकरण

इस उपकरण को बनाने के लिए शोधकर्ताओं ने MXene नैनोशीट्स और P3HT नामक कार्बनिक अर्धचालक का इस्तेमाल किया। MXene एक विद्युत प्रवाहकीय द्वि-आयामी पदार्थ है, जबकि P3HT प्रकाश के प्रति प्रतिक्रिया करने में सक्षम है। जब दोनों पदार्थों को एक-दूसरे के संपर्क में लाया जाता है, तो प्रकाश के कारण उत्पन्न विद्युत आवेश उनके संपर्क बिंदु पर अलग हो जाते हैं और लंबे समय तक अलग बने रहते हैं। इससे उपकरण में स्मृति जैसा प्रभाव पैदा होता है, यानी प्रकाश का संकेत बंद होने के बाद भी उसकी प्रतिक्रिया बनी रह सकती है।

बार-बार प्रकाश संकेत मिलने पर बढ़ती है प्रतिक्रिया

शोध के प्रमुख लेखक और IIT गुवाहाटी के भौतिकी विभाग के प्रोफेसर पी.के. गिरी के अनुसार, एक छोटा-सा प्रकाश संकेत भी ऐसी विद्युत प्रतिक्रिया पैदा कर सकता है, जो प्रकाश बंद होने के बाद जारी रहती है। उन्होंने बताया कि बार-बार प्रकाश संकेत मिलने पर उपकरण की प्रतिक्रिया और मजबूत हो सकती है। प्रयोग में दूसरे प्रकाश संकेत पर पहले की तुलना में 180 प्रतिशत अधिक तीव्र प्रतिक्रिया दर्ज की गई। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह प्रक्रिया मस्तिष्क में बार-बार उत्तेजना मिलने से सीखने की क्षमता से मिलती-जुलती है।

पारंपरिक उपकरणों के मुकाबले 500 गुना कम ऊर्जा खपत

प्रयोगशाला परीक्षणों में शोध दल ने पाया कि यह उपकरण पारंपरिक MXene-आधारित उपकरणों की तुलना में 500 गुना कम ऊर्जा की खपत करता है। कम ऊर्जा खर्च करने की यह क्षमता इसे भविष्य के ऊर्जा-कुशल इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम के लिए उपयोगी बना सकती है। शोधकर्ताओं ने कम लागत वाली समाधान-आधारित प्रसंस्करण तकनीक का इस्तेमाल करके उपकरण विकसित किया है। इसका परीक्षण चेहरे की पहचान और यातायात दृश्यों के विभाजन जैसे कार्यों में भी किया गया।

चेहरे की पहचान में 90% और यातायात विश्लेषण में 85% सटीकता

शोध के दौरान उपकरण ने चेहरे की पहचान में 90 प्रतिशत और यातायात दृश्य विभाजन में 85 प्रतिशत सटीकता दर्ज की। यातायात दृश्य विभाजन का अर्थ किसी दृश्य में सड़क, वाहन और अन्य वस्तुओं जैसे अलग-अलग हिस्सों की पहचान करना है। इन नतीजों के आधार पर शोधकर्ताओं ने बताया कि इस तकनीक का इस्तेमाल कृत्रिम दृष्टि, रोबोटिक्स और बुद्धिमान कंप्यूटिंग प्रणालियों में किया जा सकता है। हालांकि, वास्तविक परिस्थितियों में इसके व्यापक इस्तेमाल की क्षमता का आकलन करने के लिए आगे परीक्षण महत्वपूर्ण होंगे।

प्रतिष्ठित जर्नल ‘कार्बन’ में प्रकाशित हुआ शोध

इस शोध के निष्कर्ष प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल कार्बन में प्रकाशित हुए हैं। शोध दल में IIT गुवाहाटी के प्रोफेसर पी.के. गिरी के साथ संजय सुर रॉय, डॉ. संजू नंदी, देबब्रत साहू और गरिमा चौधरी शामिल हैं। इसके अलावा IIT गुवाहाटी के प्रोफेसर एम. मय्यप्पन तथा IIT खड़गपुर के सस्वता गोस्वामी और प्रोफेसर चंद्र शेखर तिवारी ने भी शोध में योगदान दिया है।

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