ऑस्ट्रेलिया में हाल ही में खोजी गई बैलिस्टा मकड़ी चींटियों को घातक जाल में धकेल देती है।
वॉशिंगटन डीसी,(अमेरिका)। ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी क्वींसलैंड के वर्षावनों में वैज्ञानिकों ने मकड़ी की एक बेहद अनोखी और अब तक अनदेखी प्रजाति की खोज की है, जिसने शिकार करने की एक असाधारण और लगभग “इंजीनियरिंग जैसी” तकनीक विकसित की है। शोधकर्ताओं के अनुसार यह मकड़ी अपने शिकार को पकड़ने के लिए एक स्प्रिंग-जैसे तनावयुक्त रेशमी जाल का इस्तेमाल करती है, जो खास तौर पर एक ही प्रकार की चींटी को निशाना बनाता है। इस अत्यधिक विशिष्ट व्यवहार को वैज्ञानिक सर्वोच्च विशिष्टता का उदाहरण मान रहे हैं।
नई प्रजाति का नाम बैलिस्टा स्पाइडर
इस नई प्रजाति को उसके अनोखे शिकार तंत्र के कारण “बैलिस्टा स्पाइडर” का उपनाम दिया गया है, क्योंकि इसका जाल प्राचीन रोमन बैलिस्टा हथियार की तरह काम करता है, जिसमें संचित ऊर्जा अचानक रिलीज होकर लक्ष्य को दूर फेंक देती थी। यह मकड़ी मुख्य रूप से आक्रामक हरी वृक्ष चींटी 'ओकोफिला स्माराग्डिना' का शिकार करती है और लगभग पूरी तरह इसी पर निर्भर दिखाई देती है।
औपचारिक नामकरण अभी बाकी
वैज्ञानिकों ने बताया, कि इस प्रजाति का औपचारिक नामकरण अभी बाकी है, लेकिन यह प्रोपोस्टिरा जीनस से संबंधित मानी जा रही है। इस खोज की शुरुआत प्रोफेसर ग्रेग एंडरसन द्वारा की गई थी, जिसके बाद मैक्वेरी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अजय नरेंद्र और शोध छात्र प्रणव जोशी के नेतृत्व में एक विस्तृत फील्ड स्टडी की गई। टीम ने कुकटाउन के पास घने वर्षावनों में 10 दिन और 10 रात तक शोध किया और हाई-स्पीड व इंफ्रारेड कैमरों की मदद से इसके व्यवहार को रिकॉर्ड किया।
दिन के समय पत्तियों के नीचे छिपी रहती है मकड़ी
अध्ययन के अनुसार यह मकड़ी दिन के समय पत्तियों के नीचे छिपी रहती है और रात होते ही सक्रिय हो जाती है। यह लगभग 50 सेंटीमीटर नीचे उतरकर एक जटिल ऊर्ध्वाधर जाल तैयार करती है, जिसमें 15 से 60 तक तनावयुक्त रेशमी धागे होते हैं। इस जाल को बनाने में इसे कई घंटे लगते हैं और यह संरचना जमीन के पास शंकु के आकार में होती है।
विशेष प्रकार का रासायनिक संकेत छोड़ती है मकड़ी
सबसे दिलचस्प प्रक्रिया तब शुरू होती है, जब मकड़ी जाल को अंतिम रूप देती है। माना जाता है, कि इस दौरान वह एक विशेष प्रकार का रासायनिक संकेत या फेरोमोन छोड़ती है, जो केवल हरी वृक्ष चींटियों को आकर्षित करता है और उन्हें आक्रामक प्रतिक्रिया देने के लिए उकसाता है। जैसे ही चींटी जाल पर हमला करती है और उसे काटती है, पूरा तनाव तंत्र सक्रिय हो जाता है।
ऊपर होते हैं मकड़ी के मुख्य जाले
इसके बाद यह जाल एक स्प्रिंग की तरह काम करते हुए चींटी को लगभग 30 सेंटीमीटर ऊपर हवा में उछाल देता है और सीधे मकड़ी के मुख्य जाले में फंसा देता है। इस प्रक्रिया में चींटी अत्यधिक त्वरण का अनुभव करती है, जिसके बाद वह पूरी तरह फंस जाती है और मकड़ी उसे सुरक्षित रूप से रेशम में लपेट लेती है।
इस प्रजाति की मकड़ी केवल एक विशिष्ट चींटी पर निर्भर
शोधकर्ताओं का कहना है, कि यह प्रकृति में अपनी तरह का अनोखा उदाहरण है, जहां जाल किसी सामान्य तरीके से नहीं बल्कि शिकार की अपनी प्रतिक्रिया से सक्रिय होता है। आमतौर पर मकड़ियाँ कई प्रकार के शिकार पकड़ती हैं, लेकिन यह प्रजाति केवल एक विशिष्ट चींटी पर निर्भर है, जो इसे और भी असाधारण बनाता है।
जैविक गुलेल प्रणाली का होता है जाल
रेशम विशेषज्ञ डॉ. जोनास वोल्फ ने इस जाल को एक “जैविक गुलेल प्रणाली” बताया है, जिसमें रेशम में ऊर्जा संग्रहित कर उसे बेहद तेज़ी से रिलीज किया जाता है। प्रयोगशाला विश्लेषण से पता चला है कि इस रेशम में असाधारण लोचदार गुण हैं, जो इसे अत्यधिक शक्ति के साथ शिकार को हवा में उछालने में सक्षम बनाते हैं।
चींटियों का सुरक्षित तरीके से शिकार करने के लिए विकसित यह तरीका
वैज्ञानिकों का मानना है, कि यह विकासवादी अनुकूलन खतरनाक और आक्रामक चींटियों का सुरक्षित तरीके से शिकार करने के लिए विकसित हुआ है। इस तकनीक के कारण मकड़ी सीधे चींटियों की भीड़ में जाने के बजाय उन्हें एक-एक करके पकड़ सकती है, जिससे उसकी सुरक्षा भी सुनिश्चित होती है। कुल मिलाकर, यह खोज न केवल मकड़ी के व्यवहार को लेकर हमारी समझ को बदलती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि प्रकृति में शिकार और शिकारी के बीच संबंध कितने जटिल और उन्नत हो सकते हैं।(एएनआई)
यह भी पढ़ेंः 'जय हिंद जय सिंध' युवाओं के लिए संदेश है: फिल्म निर्माता इंद्रजीत लंकेश