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30 साल पुराने मुकदमे पर हाई कोर्ट सख्त

30 साल से लंबित मुकदमा, सरकारी जमीन दांव पर; कमिश्नर नागपाल के फोन कॉल पर हाई कोर्ट ने लिया संज्ञान

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सरकारी नजूल भूमि से जुड़े करीब 30 साल पुराने दीवानी मुकदमे में देवी पाटन मंडल आयुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल की त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करने की पहल का संज्ञान लिया।

30 साल से लंबित मुकदमा सरकारी जमीन दांव पर कमिश्नर नागपाल के फोन कॉल पर हाई कोर्ट ने लिया संज्ञान

30-Year-Old Case: High Court Takes Note Over Govt Land Dispute |

प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) [भारत]: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने देवी पाटन मंडल आयुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल द्वारा सरकारी नजूल भूमि से संबंधित करीब 30 वर्षों से लंबित एक दीवानी मुकदमे में त्वरित कार्यवाही सुनिश्चित करने के प्रयासों का संज्ञान लिया है। न्यायालय ने पीठासीन न्यायिक अधिकारी के साथ उनकी टेलीफोन पर हुई बातचीत से जुड़े विवाद को आपराधिक अवमानना के संबंध में उचित न्यायालय के विचारार्थ भेज दिया है।

1997 से लंबित है मुकदमा

न्यायमूर्ति सैयद कमर हसन रिजवी ज्योति विद्या मंदिर बनाम नगर पालिका परिषद, गोंडा मामले में वाद संख्या 721/1997 से संबंधित स्थानांतरण आवेदन पर सुनवाई कर रहे थे। यह मुकदमा गोंडा के सिविल जज (वरिष्ठ श्रेणी) के समक्ष लंबित था और साक्ष्य के चरण तक पहुंच चुका था। मामले में अंतरिम यथास्थिति का आदेश भी लागू था। उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत अभिलेखों के अनुसार, आयुक्त नागपाल ने 21 अप्रैल को कार्यभार संभाला था। इसके बाद एक सार्वजनिक सुनवाई के दौरान उन्हें सरकारी नजूल भूमि से जुड़े विवाद और करीब तीन दशक से लंबित मुकदमे की जानकारी मिली। अपनी रिपोर्ट में आयुक्त ने बताया कि उन्होंने संबंधित उप-मंडल मजिस्ट्रेट, नगर पालिका अधिकारियों, राजस्व अधिकारियों और सरकारी वकील को मामले की जानकारी रखने तथा प्रभावी पैरवी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।

न्यायाधीश की छुट्टी को लेकर हुई बातचीत

आयुक्त ने बताया कि बाद में उन्हें पता चला कि पीठासीन न्यायिक अधिकारी लंबी छुट्टी पर हैं। 15 जुलाई को उन्होंने सिविल जज से संपर्क कर उनकी संभावित वापसी और छुट्टी बढ़ाए जाने की संभावना के बारे में जानकारी ली। आयुक्त ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि फोन कॉल का उद्देश्य केवल न्यायाधीश की छुट्टी के संबंध में जानकारी लेना था और बातचीत के दौरान लंबित मुकदमे पर कोई चर्चा नहीं हुई। इसके बाद संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर उन्होंने उसी दिन जिला न्यायाधीश से संपर्क किया और लंबे समय से लंबित मामले के शीघ्र निपटारे का अनुरोध किया।

3 अगस्त को फिर जिला जज से किया संपर्क

आयुक्त ने बताया कि 3 अगस्त को उन्होंने दोबारा जिला न्यायाधीश से संपर्क किया, क्योंकि मामला अगले दिन सुनवाई के लिए सूचीबद्ध था। जिला न्यायाधीश ने उन्हें मामले के शीघ्र निपटारे के लिए कदम उठाने का आश्वासन दिया। राज्य ने भी उच्च न्यायालय के समक्ष यह स्वीकार किया कि फोन कॉल हुई थी। राज्य की ओर से पेश वकील ने बताया कि बातचीत का उद्देश्य यह जानना था कि सिविल जज कितने समय तक छुट्टी पर रहेंगी और क्या वह अपनी छुट्टी बढ़ाने वाली हैं।

सिविल जज ने मांगा था मामले का स्थानांतरण

सिविल जज ने इस बातचीत की जानकारी जिला जज को दी और मुकदमे को स्थानांतरित करने का अनुरोध किया। इसके बाद जिला जज ने अपने न्यायालय से मामला वापस ले लिया और इसे गोंडा के सिविल जज (सीनियर डिवीजन)/एफटीसी नवीन/एसीजेएम की अदालत में स्थानांतरित कर दिया। मुकदमा पहले ही स्थानांतरित हो जाने के कारण उच्च न्यायालय ने माना कि उसके समक्ष लंबित स्थानांतरण आवेदन का उद्देश्य समाप्त हो चुका है। न्यायालय ने आवेदक को जिला न्यायाधीश के समक्ष उचित आवेदन देने और कानून के तहत उपलब्ध सभी आधार उठाने की स्वतंत्रता दी।

फोन कॉल के लहजे पर हाई कोर्ट ने जताई चिंता

हालांकि, उच्च न्यायालय ने आयुक्त और सिविल जज के बीच हुई बातचीत से संबंधित पत्र की सामग्री की अलग से जांच की। न्यायालय ने पाया कि टेलीफोन पर हुई बातचीत के लहजे और भाषा से प्रथम दृष्टया ऐसा आभास होता है कि पीठासीन अधिकारी को लगा कि उनसे इस तरह संपर्क किया जा रहा है, जिससे उन्हें प्रभावित करने का प्रयास हो सकता है। हाई कोर्ट ने जोर दिया कि न्यायिक अधिकारियों को मामलों का फैसला करने में पूर्ण स्वतंत्रता और स्वायत्तता मिलनी चाहिए तथा उन्हें बिना किसी दबाव के निडर होकर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में सक्षम होना चाहिए।

आयुक्त की सफाई को भी रिकॉर्ड पर लिया

हालांकि, उच्च न्यायालय के समक्ष मौजूद अभिलेखों में आयुक्त का स्पष्टीकरण भी शामिल था। उन्होंने कहा था कि उनकी चिंता मुकदमे के लंबे समय से लंबित होने के कारण थी और फोन कॉल का उद्देश्य केवल न्यायिक अधिकारी की छुट्टी की स्थिति की जानकारी लेना था। राज्य ने भी अदालत के समक्ष कहा कि कॉल का उद्देश्य इसी पहलू तक सीमित था।

अवमानना न्यायालय के समक्ष रखा जाएगा मामला

अजय कुमार पांडे (1996) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए उच्च न्यायालय ने न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा और न्यायिक अधिकारियों को बिना दबाव अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने देने के महत्व पर जोर दिया। उच्च न्यायालय ने कहा कि मामला स्थानांतरित होने के बाद स्थानांतरण आवेदन की वैधता समाप्त हो गई थी, लेकिन वह सिविल जज के पत्र की सामग्री को नजरअंदाज नहीं कर सकता। अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि मामले पर आपराधिक अवमानना के संबंध में उचित न्यायालय द्वारा विचार किया जाना आवश्यक है। इसके बाद हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि मुख्य न्यायाधीश या वरिष्ठ न्यायाधीश से निर्देश प्राप्त करने के बाद मामले को उचित अवमानना न्यायालय के समक्ष रखा जाए। यह आदेश 21 अगस्त, 2026 को पारित किया गया था।

(एएनआई)

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