शहर में 500 साल पुरानी ‘सास बहू की होली’ की अनोखी परंपरा निभाई जाती है। निमाड़ क्षेत्र के गोकुल चंद्रमा मंदिर में सास और बहू एक-दूसरे को रंग लगाकर साथ में नृत्य करती हैं।
बुरहानपुर। शहर में 500 साल पुरानी ‘सास बहू की होली’ की अनोखी परंपरा निभाई जाती है। निमाड़ क्षेत्र के गोकुल चंद्रमा मंदिर में सास और बहू एक-दूसरे को रंग लगाकर साथ में नृत्य करती हैं। इस दिन परिवार के मनमुटाव भुलाकर प्रेम और सद्भाव का संदेश दिया जाता है। हजारों लोग इस खास आयोजन को देखने के लिए मंदिर परिसर में जुटते हैं। साल में एक बार होने वाला यह पर्व बुरहानपुर की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है।
यहां झगड़े नहीं, प्रेम से मिलती हैं सास और बहू
आपने सास-बहू के झगड़ों की कहानियां खूब सुनी होंगी, लेकिन मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में एक ऐसी परंपरा है जहां सास और बहू एक-दूसरे को रंग लगाकर गले मिलती हैं। यहां मनाई जाती है अनोखी ‘सास बहू की होली’, जो करीब 500 साल पुरानी परंपरा मानी जाती है।
गोकुल चंद्रमा मंदिर में खास आयोजन
निमाड़ क्षेत्र के इतवारा स्थित गोकुल चंद्रमा मंदिर में हर साल यह खास आयोजन होता है। मंदिर समिति के आदित्य मुखिया बताते हैं कि यह परंपरा लगभग 500 वर्षों से चली आ रही है। इस दिन सास और बहू अपने सारे गिले-शिकवे भुलाकर मंदिर पहुंचती हैं और साथ में रंग-गुलाल लगाती हैं। मान्यता है कि इस दिन मनमुटाव खत्म कर प्रेम से होली खेलने से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
साथ झूमती हैं सास और बहुएं
मंदिर में ठाकुर जी के दर्शन के बाद सास और बहू एक-दूसरे को गुलाल लगाती हैं। फिर शुरू होता है लोकगीतों और नृत्य का सिलसिला। स्थानीय भाषा में गीत गाए जाते हैं और ढोल की थाप पर महिलाएं झूम उठती हैं। यह नजारा देखने के लिए बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक की भीड़ उमड़ पड़ती है। हजारों लोग इस आयोजन के साक्षी बनते हैं।
रिश्तों में घुलता है प्यार
साल में एक बार होने वाला यह आयोजन सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि रिश्तों को मजबूत करने का जरिया भी है। कहा जाता है कि इस दिन अगर सास-बहू साथ में रंग खेल लें तो उनके बीच का तनाव दूर हो जाता है। यही वजह है कि इस खास होली का सभी को बेसब्री से इंतजार रहता है।
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