मध्यप्रदेश में विकास कार्यों की कीमत जंगलों को चुकानी पड़ रही है। पिछले पांच वर्षों में राज्य में सड़क, रेलवे लाइन और खनन जैसी परियोजनाओं के लिए 60,000 एकड़ वन भूमि का उपयोग अन्य कार्यों में किया गया।
भोपाल। मध्य प्रदेश में विकास कार्यों की कीमत जंगलों को चुकानी पड़ रही है। पिछले पांच वर्षों में राज्य में सड़क, रेलवे लाइन और खनन जैसी परियोजनाओं के लिए 60,000 एकड़ वन भूमि का उपयोग अन्य कार्यों में किया गया है। यह आंकड़ा देश में सबसे अधिक बताया जा रहा है। आईएसएफआर रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश का वन क्षेत्र 2021 में 77,444 वर्ग किलोमीटर था, जो 2023 में घटकर 77,073 वर्ग किलोमीटर रह गया।
सबसे अधिक वन भूमि का डायवर्जन मप्र में
केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में पूरे देश में 97,050 हेक्टेयर (2,39,815 एकड़) वन भूमि का डायवर्जन किया गया है। यह भूमि वृक्षारोपण के अलावा अन्य उद्देश्यों के लिए उपयोग में लाई गई। इसमें सबसे अधिक वन भूमि डायवर्जन मध्य प्रदेश में हुआ है, जबकि दूसरे स्थान पर ओडिशा है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने यह जानकारी राज्यसभा में एक प्रश्न के उत्तर में दी।
पिछले पांच वर्षों में 24,346 हेक्टेयर वन भूमि का हुआ डायवर्जन
जानकारी के अनुसार, देश में सबसे अधिक 22,233 हेक्टेयर वन भूमि केवल सड़क निर्माण के लिए अधिग्रहित की गई है। मध्य प्रदेश में पिछले पांच वर्षों में कुल 24,346 हेक्टेयर (60,000 एकड़) वन भूमि का डायवर्जन हुआ है। सेवानिवृत्त आईएफएस अधिकारी सुदेश वाघमारे के अनुसार, “विकास के लिए ली गई वन भूमि के बदले CAMPA फंड के रूप में राशि प्राप्त होती है, जिसे वन प्रबंधन में उपयोग किया जाना चाहिए। लेकिन कई मामलों में CAMPA फंड का उपयोग भवन निर्माण जैसे कार्यों में किया गया है। यह बात पहले भी CAG रिपोर्ट में उठाई जा चुकी है।”
सैकड़ों वर्ष पुराने पेड़ काटे गये
वाघमरे ने कहा कि वन भूमि डायवर्जन के बाद सैकड़ों वर्षों पुराने पेड़ काट दिए गये। इसलिए केवल पौधे लगाना इस नुकसान की भरपाई नहीं कर सकता। यह बड़ी जिम्मेदारी है कि लगाए गए पौधे वास्तव में पेड़ बनकर विकसित हों। इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट (ISFR) के अनुसार, मध्य प्रदेश का वन क्षेत्र 2021 में 77,444 वर्ग किलोमीटर था, जो 2023 में घटकर 77,073 वर्ग किलोमीटर रह गया।हाईकोर्ट ने मध्यप्रदेश सरकार और एनटीसीए से दो हफ्तों में जवाब मांगा है।
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