प्रयागराज। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद सात साल से कम सजा वाले अपराध में गिरफ्तारी कर यूपी पुलिस यह साबित कर रही है कि उनके मन में देश के कानून के प्रति कोई सम्मान नहीं बचा है।
प्रयागराज। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद सात साल से कम सजा वाले अपराध में गिरफ्तारी कर यूपी पुलिस यह साबित कर रही है कि उनके मन में देश के कानून के प्रति कोई सम्मान नहीं बचा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए यूपी पुलिस की कार्यप्रणाली पर तल्ख टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व के फैसलों में स्पष्ट किया है कि 7 साल से कम सजा वाले अपराधों में गिरफ्तारी नियम नहीं बल्कि अपवाद होनी चाहिए। ऐसे मामलों में BNSS की धारा 35(3) (पूर्व में CrPC 41A) के तहत नोटिस जारी करना अनिवार्य है। इस निर्देश का उल्लंघन कर गिरफ्तारी करना कानूनी प्रक्रिया की अवहेलना और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन है जिसे शीर्ष अदालत ने नाजायज माना है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि पुलिस को ऐसे मामलों में गिरफ्तारी से पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए कि क्या यह वाणी यह जरूरी है। केवल पूछताछ के लिए गिरफ्तारी नहीं की जा सकती।
UP पुलिस की कार्यप्रणाली पर HC टिप्पणी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते सुप्रीम कोर्ट के आदेश को उद्धृत करते हुए यूपी पुलिस की कार्यप्रणाली पर तल्ख टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद सात साल से कम सजा वाले अपराध में गिरफ्तारी कर यूपी पुलिस यह साबित कर रही है कि उनके मन में देश के कानून के प्रति कोई सम्मान नहीं बचा है। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति सिद्धार्थ, न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ सचिन आर्य व अन्य की ओर से दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर की है। मामला प्रयागराज के धूमनगंज थाना क्षेत्र का है। याची को पुलिस ने आयुध अधिनियम से जुड़े मामले में गिरफ्तार किया था। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि आरोपित धाराओं में न्यूनतम सजा दो और अधिकतम पांच वर्ष की है। ऐसे में गिरफ्तारी प्रथम दृष्टया अवैध है। क्योंकि, पुलिस ने बीएनएसएस के तहत नोटिस दिए बिना यह कार्रवाई की थी।
HC आदेश पालन न करने पर पुलिस फटकार
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एसके अंतिल के मामले में दिए फैसले का हवाला देते हुए कहा कि सात वर्ष से कम दंडनीय अपराधों में बीएनएसएस की धारा-35 (3) पालन किए बिना गिरफ्तारी नहीं की जा सकती। कोर्ट ने पाया कि अवैध हिरासत मानते हुए हाईकोर्ट ने 12 फरवरी को ही बिना प्रमाणित प्रति की प्रतीक्षा किए तत्काल रिहाई का आदेश दिया। लेकिन, 17 फरवरी को अदालत को बताया गया कि सुबह 11 बजे आदेश पारित होने के बावजूद याची को अगले दिन सुबह पौने नौ बजे छोड़ा गया। यानी करीब 20 घंटे से अधिक की देरी।
कोर्ट ने इस गंभीर अवमानना माना और संबंधित थाना प्रभारी व उपनिरीक्षक (इंचार्ज) के आचरण को सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना बताया। कोर्ट ने अधिकारियों की बिना शर्त माफी की अर्जी भी खारिज कर दी। साथ ही पुलिस आयुक्त को प्रयागराज के दोषी अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। हालांकि, कोर्ट पीड़ित को मुआवजा दिलाने की मांग नहीं मानी, कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में मुआवजा नहीं दिया जा सकता। हालांकि, कोर्ट ने मुआवजे के लिए याची को अन्य वैधानिक उपाय अपनाने की स्वतंत्रता प्रदान की है।
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