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पश्चिम बंगाल की छोटी विधानसभा माने जाने वाले...

पश्चिम बंगाल की छोटी विधानसभा माने जाने वाले कोलकाता नगर निगम में हुआ बेनजीर वाकया

कोलकाता। पश्चिम बंगाल की छोटी विधानसभा माने जाने वाले कोलकाता नगर निगम में बेनजीर वाकया हुआ...

पश्चिम बंगाल की छोटी विधानसभा माने जाने वाले कोलकाता नगर निगम में हुआ बेनजीर वाकया

पश्चिम बंगाल की छोटी विधानसभा माने जाने वाले कोलकाता नगर निगम में हुआ बेनजीर वाकया |

कोलकाता। पश्चिम बंगाल की छोटी विधानसभा माने जाने वाले कोलकाता नगर निगम में बेनजीर वाकया हुआ। निगम के वार्ड काउंसिलरों को मासिक अधिवेशन के लिए सभा कक्ष नहीं खोला गया और उन्हें काउंसिलर क्लब के कक्ष में मासिक अधिवेशन करना पड़ा। इसके पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था। मेयर फिरहाद हकीम ने कहा कि राज्य में नई सरकार बनने के बाद काउंसिलरों के अधिकारो का हनन लोकतंत्र पर कुठाराघात है। जिस तरह विधानसभा के विधायक जनप्रतिनिधि हैं, उसी प्रकार काउंसिलर भी जनप्रतिनिधि हैं। 

कोलकाता नगर निगम की चेयर परसन (अध्यक्ष) माला राय का कहना है कि मासिक अधिवेशन की तारीख पहले से तय थी, लेकिन उन्हें रात में अधिवेशन के स्थगित होने की सूचना दी गई। अधिवेशन स्थगित करने का अधिकार उन्हे हैं। उनके कहने पर ही निगम के कमिश्नर या सचिव स्थगित की नोटिस दे सकते है। ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं हुई। मेयर समेत सभी काउंसिलर मासिक अधिवेशन में शामिल होने के लिए मौजूद हुए, लेकिन सरकार की ओर से एक दिन में नियुक्त किए गए नए सचिव ने अधिवेशन के कक्ष को बंद करवा दिया।

जब उनसे कक्ष को बंद का कारण पूछा गया तो उन्होंने कार्यभार नहीं संभालने की दलील देकर अपना पल्ला झाड़ लिया। ऐसी स्थिति में चेयर परसन के निर्देश पर मासिक अधिवेशन काउंसिलर कक्ष में हुई। जानकारों के अनुसार, कोलकाता निगर निगम में तृणमूल कांग्रेस के काउंसिलर बहुमत में हैं और उनके हाथ में ही परिषद है। तृणमूल कांग्रेस के ही मेयर और चेयन परसन है। भाजपा की सरकार बनने के बाद सरकार और निगम में टकराव की स्थिति पैदा हो गई है। जब तक चुनाव नही होता तब तक तृणमूल कांग्रेस के हाथ में ही परिषद रहेगा।

उसकी दिसंबर तक मियाद है, लेकिन परिषद के सामने काम नहीं करने देने की स्थिति उत्पन्न हो गई है। कोलकाता के आसपास के उपनगरों में नगर पलिकाओं में भी तूणमूल कांग्रेस के काउंसिलरों का ही बोर्ड है, लेकिन भाजपा की सरकार बनने के बाद तृणमूल कांग्रेस के काउंसिलरों पर राजीतिक कारणों से इस्तीफा देना पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में वहां सरकार की ओर से एडमिनिस्ट्रेटर बैठाए जा रहे हैं। इसका फायदा भाजपा को मिल सकता है।

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