वाराणसी। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जनपद का नाम बदल कर "बरन नगर" रखा जाएगा। यह बात प्रदेश की योगी सरकार में राज्य मंत्री रविंद्र जायसवाल ने वाराणसी में बरनवाल वैश्य समाज की ओर से आयोजित महाराजा अहिबरन की जयंती समारोह में अपने संबोधन में कही।
अहिबरन राजा ने की थी बरन नगर की स्थापना, लगभग 1200 साल पुराना है इतिहास
बुलंदशहर का पुराना नाम बरन (Baran) था, जिसकी स्थापना अहिबरन राजा ने की थी। बाद में यह "ऊँचा शहर" (Bulandshahr) कहलाने लगा क्योंकि यह एक ऊँची जगह पर बसा था। अब बरनवाल समाज 1200 साल पुरानी ऐतिहासिक गलती को सुधारकर जिले का नाम बदल कर बरन नगर रखने की मांग कर रहा है। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार यह शहर ऊँची भूमि पर स्थित था, इसलिए फ़ारसी में इसे 'बलंद शहर' (ऊँचा शहर) कहा जाने लगा, जो बाद में बुलंदशहर बन गया। बरनवाल समुदाय का संबंध इसी शहर से है, और इसका इतिहास लगभग 1200 साल पुराना है, जिसमें बरन टॉवर और ऊपर कोट जैसे ऐतिहासिक स्थल शामिल हैं।
महाराजा अहिबरन की जयंती पर हुआ था समारोह का आयोजन
बरनवाल वैश्य समाज की ओर से वाराणसी के भरत मिलाप मैदान में बरनवाल सेवा समिति, महिला समिति और युवक संगठन की ओर से महाराजा अहिबरन की जयंती समारोह का आयोजन किया गया था। योगी सरकार में राज्य मंत्री रविंद्र जायसवाल ने कहा कि समाज के पदाधिकारियों ने कार्यक्रम के जरिए एकता का सुंदर संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि जल्द से जल्द बुलंदशहर का नाम बरन नगर होगा। मंत्री की इस घोषणा के बाद महाराजा अहिबरन और बुलंदशहर के नाम बदलाव की चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया है।
एशियेटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल के जर्नल में भी मिलता है अहिबरन साम्राज्य का उल्लेख
बरनवाल वैश्य समुदाय का इतिहास अत्यंत प्राचीन, समृद्ध और गौरवशाली रहा है। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल के साथ-साथ पड़ोसी देश नेपाल में इस समाज की बड़ी आबादी निवास करती है। "एशियेटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल" के जर्नल में भी अहिबरन साम्राज्य का उल्लेख मिलता है। इसके अनुसार यह साम्राज्य अत्यंत संपन्न था, जहां ताम्रपत्रों के अभिलेख और चांदी की मुद्राओं का प्रचलन था।
अहिबरन के अस्तित्व को लेकर इतिहासकारों में लंबे समय तक रहे मतभेद
अंग्रेजी शासनकाल में भी बरनवाल समुदाय के लोग ‘रायबहादुर’ की उपाधि के साथ जमींदारी करते थे। बरनवाल समाज में कुल 36 गोत्र माने जाते हैं। इतिहासकारों में अहिबरन के अस्तित्व को लेकर लंबे समय तक मतभेद रहे हैं। एफएस ग्रोज ने एशियाटिक सोसाइटी के जर्नल में यह सिद्धांत दिया कि अहिबरन कोई ऐतिहासिक राजा नहीं थे, बल्कि बरन का अर्थ किला होता है।
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