नदी की स्वच्छता की पड़ताल के दौरान एक नगरपालिका कर्मचारी पर दबाव बनाकर कथित तौर पर गंदा पानी पिलाया गया, जिससे उसकी तबीयत बिगड़ गई और उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।
मंडला (मध्य प्रदेश): जिस संस्था का दायित्व मानव अधिकारों की रक्षा करना है, यदि उसी के प्रतिनिधि पर एक कर्मचारी को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के आरोप लगने लगे, तो यह केवल एक घटना नहीं बल्कि व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। नर्मदा नदी की स्वच्छता की पड़ताल के दौरान जो कुछ हुआ, उसका वीडियो अब चर्चा का विषय बना हुआ है। आरोप है कि एक नगरपालिका कर्मचारी पर दबाव बनाकर कथित तौर पर गंदा पानी पिलाया गया, जिसके बाद उसकी तबीयत बिगड़ गई और उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। अब यह मामला राजनीतिक रंग भी ले चुका है।
कर्मचारी पर पानी पीने का दिया गया दबाव
नर्मदा नदी में मिल रहे कथित प्रदूषित जल की जांच के लिए राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के एक सदस्य का दौरा हुआ था। इसी दौरान नर्मदा तट के पास जमा पानी को लेकर विवाद खड़ा हो गया। नगरपालिका परिषद के कर्मचारी पुष्पेंद्र पांडे का आरोप है कि उन्हें मौके पर बुलाकर उस पानी को पीने के लिए दबाव बनाया गया। कर्मचारी का कहना है कि उन्होंने अधिकारियों को समझाने का प्रयास किया कि यह गंदा नाला नहीं बल्कि पुलिस लाइन की टंकी का ओवरफ्लो पानी है, लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गई।
दबाव देने के बाद कर्मचारी ने पीया पानी
कर्मचारी के अनुसार बार-बार दबाव बनाए जाने के बाद उन्होंने पानी पीकर दिखाया, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। उनका कहना है कि घटना के बाद वे पूरी रात तनाव में रहे और अगले दिन उनकी तबीयत बिगड़ गई, जिसके बाद उन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।
मानवता और संवेदनशीलता पर उठने लगे सवाल
यह घटना अब केवल नर्मदा की स्वच्छता तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि मानवता और संवेदनशीलता पर भी सवाल खड़े कर रही है। जिस मानव अधिकार आयोग का उद्देश्य आम नागरिकों और कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा करना है, उसी आयोग के सदस्य पर एक छोटे कर्मचारी पर दबाव बनाने के आरोप लगना कई गंभीर प्रश्न छोड़ जाता है। क्या किसी जांच या निरीक्षण के दौरान किसी कर्मचारी की गरिमा और सम्मान को इस तरह दांव पर लगाया जा सकता है? यह सवाल अब चर्चा के केंद्र में है।
कांग्रेस ने की घटना की कड़ी निंदा
मामले ने अब राजनीतिक स्वरूप भी ले लिया है। कांग्रेस ने इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग की है। कांग्रेस जिला अध्यक्ष अशोक मर्सकोले का कहना है कि यदि किसी कर्मचारी को प्रताड़ित किया गया है तो यह निंदनीय है और इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। साथ ही उन्होंने नर्मदा में मिलने वाले गंदे नालों को स्थायी रूप से बंद करने की मांग भी उठाई है।
मानव अधिकारों की रक्षा के दावों पर लगा प्रश्नचिह्न
"नर्मदा की स्वच्छता का मुद्दा निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है किसी व्यक्ति की गरिमा और सम्मान। यदि सचमुच एक छोटे कर्मचारी को दबाव और अपमान का सामना करना पड़ा है, तो यह घटना मानव अधिकारों की रक्षा के दावों पर ही प्रश्नचिह्न लगा देती है। अब सभी की निगाहें प्रशासन और जांच पर टिकी हैं कि आखिर इस पूरे घटनाक्रम की सच्चाई क्या है और जिम्मेदारी किसकी तय होती है।