मध्यप्रदेश में इस वर्ष सरकारी खजाने पर खर्च का बोझ तेजी से बढ़ा है। वित्तीय हालात ऐसे बन गए हैं कि कुल बजट का बड़ा हिस्सा पहले ही विभिन्न मदों में उपयोग हो चुका है।
भोपाल। मध्यप्रदेश में इस वर्ष सरकारी खजाने पर खर्च का बोझ तेजी से बढ़ा है। वित्तीय हालात ऐसे बन गए हैं कि कुल बजट का बड़ा हिस्सा पहले ही विभिन्न मदों में उपयोग हो चुका है। स्थिति यह है कि सरकार को कई महत्वपूर्ण विकास योजनाओं की गति कम करनी पड़ी है और कुछ बड़े प्रोजेक्ट अस्थायी रूप से रोक दिए गए हैं।
अनिवार्य खर्चों के कारण विकास से जुड़े क्षेत्रों के लिए है सीमित संसाधन
सूत्रों बताते हैं कि राज्य के बजट का अधिकांश भाग मुफ्त योजनाओं, कर्मचारियों के वेतन-भत्तों, पेंशन और कर्ज के ब्याज भुगतान में खर्च हो गया है। इन अनिवार्य खर्चों के चलते विकास से जुड़े क्षेत्रों के लिए सीमित संसाधन ही उपलब्ध रह गए हैं। इसी कारण सड़क, पानी और मेट्रो जैसी बड़ी बुनियादी परियोजनाओं को फिलहाल आगे बढ़ाना कठिन हो गया है।
करीब 70 प्रतिशत हिस्सा पहले ही हो चुका है उपयोग
वित्त विभाग से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि कुल बजट का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा पहले ही उपयोग में आ चुका है। इसमें सामाजिक कल्याण योजनाओं के साथ-साथ प्रशासनिक खर्चों का बड़ा योगदान है। विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार बढ़ते राजस्व व्यय ने सरकार की वित्तीय लचीलापन क्षमता को प्रभावित किया है।
अब खर्चों की प्राथमिकता तय करने पर जोर दे रही सरकार
प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि सरकार अब खर्चों की प्राथमिकता तय करने पर जोर दे रही है। नए प्रोजेक्ट शुरू करने के बजाय पहले से चल रही योजनाओं को पूरा करने और वित्तीय संतुलन बनाए रखने की रणनीति पर काम किया जा रहा है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि राजस्व बढ़ाने के नए स्रोत नहीं खोजे गए, तो आने वाले समय में विकास कार्यों पर और असर पड़ सकता है। फिलहाल सरकार की चुनौती यह है कि सामाजिक दायित्वों और विकास आवश्यकताओं के बीच संतुलन कैसे साधा जाए।
यह भी पढ़ें: https://www.primenewsnetwork.in/state/senior-storyteller-gyanranjan-passes-away-an-era-in-hindi-literature-ends/104104
वरिष्ठ कथाकार ज्ञानरंजन का निधन, हिंदी साहित्य की एक युग की समाप्ति