जिले में किसान-नेतृत्व वाली प्राकृतिक खेती अपना रहे हैं। इससे फसल नुकसान, मिट्टी के क्षरण और मजबूरी में होने वाले पलायन को पलटती जा रही है।
बैतूल। जिले में किसान-नेतृत्व वाली प्राकृतिक खेती अपना रहे हैं। इससे फसल नुकसान, मिट्टी के क्षरण और मजबूरी में होने वाले पलायन को पलटती जा रही है। सैगोहन वॉटरशेड यह दर्शाता है कि किसान-केंद्रित कार्यक्रम कैसे लोगों के नेतृत्व वाले कृषि-पारिस्थितिक आंदोलनों में बदल सकते हैं। बाहरी इनपुट्स की जगह आपसी सीख और स्थानीय संस्थाओं को प्राथमिकता देकर यह पहल मजबूत और टिकाऊ कृषि प्रणालियों का पुनर्निर्माण कर रही है।
संघर्ष से बदलाव तक
बैतूल जिले की जंगलों से घिरी पहाड़ियों में छोटे आदिवासी किसान लंबे समय से अनियमित वर्षा, घटती मिट्टी की उर्वरता और लगातार फसल विफलता से जूझते रहे हैं। वर्षों तक इन दबावों ने कई परिवारों को रोज़गार की तलाश में पलायन करने के लिए मजबूर किया। हालांकि सैगोहन वॉटरशेड में किसान एक अप्रत्याशित परिवर्तन का नेतृत्व कर रहे हैं। जो क्षेत्र कभी कम उत्पादकता के लिए जाना जाता था, वह अब कृषि-पारिस्थितिक लचीलापन (एग्रोइकोलॉजिकल रेज़िलिएंस) का जीवंत उदाहरण बनकर उभर रहा है।
इस बदलाव के केंद्र में है राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) का जीवा (JIVA) कृषि-पारिस्थितिकी कार्यक्रम, जिसे गैर-लाभकारी संस्था नमन सेवा समिति (NSS) ने वासन (WASSAN) के तकनीकी सहयोग से लागू किया। जर्मन विकास एजेंसी GIZ ने अपने SuATI कार्यक्रम के तहत वित्तीय सहयोग प्रदान किया। इन संयुक्त प्रयासों ने एक वॉटरशेड विकास परियोजना को समुदाय-नेतृत्व वाले प्राकृतिक खेती आंदोलन में बदल दिया।
नींव की तैयारी
इस कहानी की शुरुआत नाबार्ड के वॉटरशेड डेवलपमेंट फंड कार्यक्रम से होती है, जिसका उद्देश्य सैगोहन, नक्तीधाना और झिरनधाना गांवों की क्षतिग्रस्त भूमि को पुनर्जीवित करना था। मिट्टी के कटाव को रोकने और भूजल पुनर्भरण बढ़ाने के लिए कई जल-संरक्षण संरचनाएं बनाई गईं। इनमें 309.81 रनिंग मीटर निरंतर कंटूर ट्रेंच, 1,976.9 रनिंग मीटर चरणबद्ध कंटूर ट्रेंच और 1,359 जल-अवशोषण खाइयां शामिल थीं। इसके अतिरिक्त, 20,000 मीटर से अधिक खेत मेड़, 32,000 मीटर से अधिक पत्थर की मेड़ और 244 पत्थर आउटलेट बनाए गए ताकि अतिरिक्त बहाव को सुरक्षित रूप से नियंत्रित किया जा सके।
इन संरचनाओं ने 885 एकड़ भूमि में फिर से जान डाल दी और लगभग 280 किसानों को लाभ पहुंचाया। इसके साथ ही एक किसान उत्पादक संगठन (FPO) और वॉटरशेड समिति का गठन किया गया। जीवा कार्यक्रम को जानबूझकर इसी सामाजिक और भौतिक आधार पर खड़ा किया गया। गांव की वॉटरशेड समिति के अध्यक्ष मुगिलाल कासदेकर कहते हैं, “अब जीवा के तहत हम इसी आधार पर मिट्टी की उर्वरता, जैव-द्रव्यमान और जैव-विविधता का निर्माण कर रहे हैं।”
किसान ही शिक्षक: नया विस्तार मॉडल
जीवा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पारंपरिक, विशेषज्ञ-आधारित विस्तार मॉडल से हटकर किसान-से-किसान सीख को प्राथमिकता देता है। वर्ष 2023 में इस दृष्टिकोण को और मजबूती मिली जब आंध्र प्रदेश के कम्युनिटी मैनेज्ड नेचुरल फार्मिंग कार्यक्रम से एक बाहरी किसान संसाधन व्यक्ति (EFRP) को गांव में लंबे समय के लिए तैनात किया गया। सैगोहन में ई. सुदर्शन ने 120 दिनों तक किसानों के साथ मिलकर काम किया और पांच लीड किसानों को प्रशिक्षित किया। उन्होंने मिलकर फसल मॉडल तैयार किए, समूह बनाए और स्थानीय जरूरतों के अनुसार जीवामृत, घन जीवामृत, नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र, दशपर्णी जैसे जैव-इनपुट्स बनाना सीखा।
प्रत्येक लीड किसान लगभग 40 किसानों का कर रहा मार्गदर्शन
नक्तीधाना के किसान नामू धुर्वे कहते हैं, “जब हमने बिना रसायन के सब्जियां उगती देखीं, तो लगा जैसे हमारे सामने एक नई दुनिया खुल गई हो। प्राकृतिक खेती मतलब गाय, पेड़, मिट्टी और फसल को फिर से जोड़ना—यही असली खेती है।” सहकर्मी सीख से विस्तार 2024 तक यह आंदोलन गति पकड़ चुका था। प्रत्येक लीड किसान लगभग 40 किसानों का मार्गदर्शन करने लगा। इस तरह लगभग 200 किसान करीब 100 एकड़ में प्राकृतिक खेती करने लगे। आंतरिक भ्रमणों के जरिए किसानों ने विविध फसल प्रणालियां और कम लागत वाले जैव-इनपुट निर्माण को प्रत्यक्ष देखा। नक्तीधाना के मदन इवाने, झिरनधाना के रमेश उइके और सैगोहन के कमलेश बारस्कर जैसे “स्टार किसान” उभरे, जो अन्य किसानों को कीट प्रबंधन, फसल योजना और इनपुट तैयारी में सहयोग दे रहे हैं।
महिलाओं की बढ़ती भूमिका
शुरुआत में कम भागीदारी के बावजूद अब महिलाएं इस प्रक्रिया के केंद्र में आ रही हैं। सैगोहन की पार्वती बारस्कर को महिला किसान संसाधन व्यक्ति के रूप में प्रशिक्षित किया गया है। वे लगभग 40 महिलाओं को किचन गार्डनिंग और जैव-इनपुट निर्माण में मार्गदर्शन देती हैं, जिससे पोषण सुरक्षा और लैंगिक समावेशन दोनों को बल मिला है।
स्थानीय संस्थाओं से जवाबदेही
वॉटरशेड परियोजना के दौरान बनी ग्राम वॉटरशेड समितियां (VWC) इस पहल की संस्थागत रीढ़ हैं।2 ये समितियां कार्य योजनाओं का सत्यापन करती हैं और कार्य प्रमाणन के बाद ही लीड किसानों को ₹5,000 मासिक मानदेय दिया जाता है।
भीतर से संचालित परिवर्तन
आज सैगोहन वॉटरशेड का परिदृश्य विविध फसलों से भरा है—बाजरा, कोदो, कुटकी, मूंगफली, अरहर, उड़द, मूंग, गेहूं, मक्का, तिल, सब्जियां और हरी मटर। किसान हर मंगलवार को झल्लार के साप्ताहिक हाट में ताजा उपज बेचते हैं। यह कार्यक्रम दिखाता है कि जब किसान नेतृत्व करते हैं, तो कृषि-पारिस्थितिक बदलाव तेज़ी से और गहराई से जड़ें जमाते हैं। बैतूल की पहाड़ियों में टिकाऊ भविष्य रसायनों से नहीं, बल्कि ज्ञान, अनुभव, समुदाय और साझा नेतृत्व से आकार ले रहा है।
यह भी पढ़ें: https://www.primenewsnetwork.in/state/additional-commissioner-and-executive-engineer-suspended-after-15-people-death/103478
जहरीला पानी से 15 लोगों की मौत के बाद एडिशनल कमिश्नर और एक्जीक्यूटिव इंजीनियर सस्पेंड