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किस्तों में भ्रष्टाचार की लड़ाई या राजनीतिक नैरेटिव?

Bihar News : बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर का नया तेवर चर्चा का विषय बना हुआ है। जन सुराज पार्टी के नेता पीके ने जब बीजेपी और जेडीयू के पांच बड़े नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए

किस्तों में भ्रष्टाचार की लड़ाई या राजनीतिक नैरेटिव

किस्तों में भ्रष्टाचार की लड़ाई या राजनीतिक नैरेटिव? |

Bihar News : बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर का नया तेवर चर्चा का विषय बना हुआ है। जन सुराज पार्टी के नेता पीके ने जब बीजेपी और जेडीयू के पांच बड़े नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए तो यह माना गया कि वे सत्ता के खिलाफ सीधी लड़ाई छेड़ रहे हैं। मगर ताज़ा घटनाक्रम ने इस अभियान को नए सवालों के घेरे में ला दिया है। अब वे कह रहे हैं कि “जन सुराज कोई जांच एजेंसी नहीं है और जिन नेताओं ने गलती मान ली या चुप्पी साध ली, उन पर वे आगे नहीं बोलेंगे।

यह बयान पहली नज़र में व्यावहारिक लग सकता है। पीके का कहना है कि वे जनता को सचेत करने आए हैं, न कि सीबीआई-ईडी की तरह जांच करने। लेकिन असली सवाल यही है—क्या भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप केवल “गलती मानने” या “चुप रहने” भर से खत्म हो जाते हैं? जनता जिसे भ्रष्ट मान चुकी है, क्या उसके लिए यही पर्याप्त है कि वह हाथ जोड़ ले और मामले को रफ़ा-दफ़ा मान लिया जाए?

पीके की रणनीति साफ है—वे किस्तों में खुलासे कर रहे हैं। इससे मीडिया में बने रहना आसान है और जनता के बीच धीरे-धीरे यह धारणा बैठाना संभव है कि “बड़े नेता भ्रष्ट हैं।” यह तरीका राजनीतिक तौर पर कारगर हो सकता है, मगर इससे एक और सवाल उठता है—क्या यह भ्रष्टाचार के खिलाफ असली लड़ाई है, या महज़ नैरेटिव मैनेजमेंट?

'सरकार बनने पर नेताओं-अफसरों की फाइलें खोली जाएंगी'

जन सुराज का यह कहना कि 'सरकार बनने पर 100 बड़े नेताओं-अफसरों की फाइलें खोली जाएंगी' दरअसल चुनावी वादा है। यह वादा जनता को उम्मीद देता है कि आने वाले समय में असली जांच होगी। लेकिन अभी के लिए यह अभियान “नैतिक दबाव” तक सीमित है। यानी फिलहाल पीके जनता की अदालत में लड़ाई लड़ रहे हैं, न कि अदालत-ए-कानून में।

बिहार की जनता इस नई राजनीति को ध्यान से देख रही है। भ्रष्टाचार राज्य की सबसे गहरी बीमारियों में से एक है, इसलिए किसी भी गंभीर पहल का स्वागत होगा। मगर जनता यह भी जानती है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई केवल किस्तों में आरोप लगाने या गलती मानने पर माफ कर देने से आगे बढ़कर होनी चाहिए।

प्रशांत किशोर अगर वाकई इस एजेंडे को आगे बढ़ाना चाहते हैं, तो उन्हें यह साफ करना होगा कि यह “किस्तों की राजनीति” महज़ चुनावी हथकंडा नहीं, बल्कि असली सिस्टम बदलने की तैयारी है। जनता अब केवल भाषणों और आरोपों से संतुष्ट नहीं होती। वह कार्रवाई और ठोस नतीजे चाहती है।

बिहार की राजनीति में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई तभी असरदार होगी, जब यह नैरेटिव से निकलकर नीतियों और संस्थागत सुधार तक पहुंचे। वरना यह भी वही कहानी होगी, जिसमें नेताओं की फाइलें चुनाव के मौसम तक खोली जाती हैं और बाद में फिर से ताले में बंद कर दी जाती हैं।

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