दिल्ली के सदर बाजार रामलीला मैदान में आयोजित रामलीला समारोह में शामिल होने के बाद, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान (सेवानिवृत्त) ने सोमवार को भारत की सांस्कृतिक परंपराओं की सराहना की।
नई दिल्ली: दिल्ली के सदर बाजार रामलीला मैदान में आयोजित रामलीला समारोह में शामिल होने के बाद, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान (सेवानिवृत्त) ने सोमवार को भारत की सांस्कृतिक परंपराओं की सराहना की। उन्होंने महाकाव्य रामायण का उल्लेख करते हुए युद्ध में नैतिकता, संयम और सम्मान के महत्व पर प्रकाश डाला। पत्रकारों से बातचीत के दौरान चौहान ने कहा कि सदर बाजार की रामलीला पिछले सात दशकों से अधिक समय से भारत की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखे हुए है। उन्होंने इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए आयोजन समिति का आभार भी जताया। उन्होंने कहा, “मुझे बताया गया है कि यह परंपरा यहां कम से कम पिछले 72 वर्षों से चली आ रही है। यह हमारी संस्कृति और परंपरा को आगे बढ़ाती है। मैं इसके लिए समिति का आभारी हूं।”
राम और रावण के युद्ध से मिली नैतिकता की सीख
भगवान राम और रावण के बीच हुए अंतिम युद्ध का जिक्र करते हुए चौहान ने प्राचीन समय में युद्ध के दौरान धर्म और नैतिकता के सिद्धांतों पर बात की। उन्होंने कहा कि जब युद्ध के दौरान रावण थक गया था और उसका रथ खराब हो गया था, तब भगवान राम ने उस पर हमला नहीं किया। इसके बजाय, भगवान राम ने रावण को घर जाकर आराम करने और अगले दिन पूरी तैयारी के साथ युद्ध में लौटने का अवसर दिया। चौहान ने इस प्रसंग को न्यायपूर्ण युद्ध के सिद्धांतों का उदाहरण बताया। उन्होंने कहा, “भगवान राम और रावण के बीच युद्ध लगभग सात दिनों तक चला। यह एक न्यायपूर्ण युद्ध था। मुझे बताया गया है कि एक दिन रावण थक गया था और उसका रथ खराब हो गया था। उस दिन भगवान राम ने रावण से युद्ध नहीं किया, बल्कि उसे घर जाकर आराम करने और अगले दिन वापस आकर अपनी शक्ति का आकलन करने के लिए कहा। जब कोई योद्धा अपने हथियार डाल देता है, तो उसे मारा नहीं जाता। प्राचीन काल में युद्ध इसी प्रकार लड़े जाते थे। हम इन्हें न्यायपूर्ण युद्ध कहते हैं।”
युद्ध में सम्मान और संयम का महत्व
चौहान के इस बयान में संघर्ष के दौरान भी नैतिक मूल्यों, सम्मान और संयम बनाए रखने के महत्व को रेखांकित किया गया। रामायण का यह प्रसंग न्यायपूर्ण युद्ध की उस अवधारणा को दर्शाता है, जिसमें जीत हासिल करने के साथ-साथ प्रतिद्वंद्वी के प्रति सम्मान और आचरण के निर्धारित सिद्धांतों का पालन भी महत्वपूर्ण माना जाता है। रामलीला प्राचीन हिंदू महाकाव्य रामायण का पारंपरिक नाट्य रूपांतरण है। इसका मंचन कई दिनों तक चलता है और आमतौर पर नवरात्रि के दौरान आयोजित किया जाता है। इसका समापन विजयदशमी यानी दशहरे पर होता है, जो भगवान राम की रावण पर विजय का प्रतीक है। इन प्रस्तुतियों में भगवान राम के जीवन, उनके गुणों और उनकी वीरतापूर्ण यात्रा को दर्शाया जाता है। साथ ही, इनके माध्यम से धर्म, कर्तव्य और बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश भी दिया जाता है।
सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने में अहम भूमिका
रामलीला उत्सव भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन आयोजनों के जरिए रामायण की शिक्षाओं को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाया जाता है और समुदायों को एक साथ आने का अवसर मिलता है।
(एएनआई)
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