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बंदूक से सिलाई मशीन तक, मध्य प्रदेश में नक्सलियों की नई शुरुआत

बालाघाट। मध्य प्रदेश के बालाघाट में आत्मसमर्पण कर चुके नक्सली अब जंगलों में बंदूक चलाने की जगह सिलाई...

बंदूक से सिलाई मशीन तक मध्य प्रदेश में नक्सलियों की नई शुरुआत

बंदूक से सिलाई मशीन तक, मध्य प्रदेश में नक्सलियों की नई शुरुआत |

बालाघाट। मध्य प्रदेश के बालाघाट में आत्मसमर्पण कर चुके नक्सली अब जंगलों में बंदूक चलाने की जगह सिलाई, ड्राइविंग और JCB चलाना सीख रहे हैं। पुलिस की मदद से वे मुख्यधारा के समाज में फिर से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

दे रहे हैं जीवन को नई दिशा

घने जंगलों में ट्रिगर दबाने से लेकर अब सुई में धागा डालने और वाहन चलाना सीखने तक बालाघाट जिले में आत्मसमर्पण करने वाले नक्सली अब रोजमर्रा के कौशल सीखकर अपने जीवन को नई दिशा दे रहे हैं।

पुलिस कर रही मदद

ये पूर्व नक्सली अब शांति का रास्ता अपनाकर जीवन की नई शुरुआत कर रहे हैं। बालाघाट, जो कभी नक्सल प्रभावित क्षेत्र था, अब बदल रहा है और पुलिस इन लोगों को समाज में फिर से स्थापित करने में मदद कर रही है।

नक्सल मुक्त होने का दावा

पिछले वर्ष दिसंबर में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा था कि राज्य नक्सल समस्या से मुक्त हो चुका है। केंद्र सरकार ने भी 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद खत्म करने का लक्ष्य रखा है।

कौशल प्रशिक्षण के जरिए नई शुरुआत

बालाघाट के पुलिस अधीक्षक आदित्य मिश्रा ने बताया, जो नक्सली पहले बंदूक चलाते थे, वे अब सिलाई, ड्राइविंग और JCB चलाना सीख रहे हैं। जिले को नक्सलवाद से मुक्त करने के बाद पुलिस उन्हें आत्मनिर्भर बनाने और समाज में वापस लाने में मदद कर रही है। इस समय 10 आत्मसमर्पित नक्सली (5 पुरुष और 5 महिलाएं) पुलिस लाइन में सिलाई और ड्राइविंग का प्रशिक्षण ले रहे हैं। सब-इंस्पेक्टर राजाराम विश्वकर्मा के अनुसार, ये लोग लगभग डेढ़ महीने से टेलरिंग सीख रहे हैं ताकि वे खुद का रोजगार शुरू कर सकें।

प्रभावित परिवारों को भी मदद

पुलिस ने उन 14 लोगों के परिवारों को भी नौकरी दी है, जिन्हें नक्सलियों ने पुलिस का मुखबिर होने के शक में मार दिया था। इस पहल से उन परिवारों को राहत मिली है, जो अपने प्रियजनों की मौत के बाद दुख और परेशानी में जी रहे थे।

प्रेरणादायक उदाहरण

सुमित, जिनके पिता की हत्या 2002 में हुई थी, शुरुआत में पुलिस नौकरी को लेकर डरते थे, लेकिन अब वे इसे स्वीकार कर रहे हैं। संजय कुमार पूसम, जिनके पिता की भी नक्सल हिंसा में मौत हुई थी, सिर्फ 8वीं तक पढ़े थे और उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि उन्हें पुलिस में नौकरी मिलेगी।

सकारात्मक बदलाव की कोशिश

पुलिस अधीक्षक ने कहा, सरकार और विभाग की नीतियों के जरिए हम नक्सलियों और हिंसा से प्रभावित परिवारों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने की कोशिश कर रहे हैं। इससे समाज में भी अच्छा संदेश जा रहा है।

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