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लिंचिंग पर आयोग को हाईकोर्ट की फटकार

मानवाधिकार आयोग पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, लिंचिंग मामलों पर उठाए सवाल

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुस्लिमों पर हमले और लिंचिंग की घटनाओं पर स्वतः संज्ञान नहीं लेने को लेकर National Human Rights Commission (एनएचआरसी) की कार्यप्रणाली पर सख्त टिप्पणी की है।

मानवाधिकार आयोग पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी लिंचिंग मामलों पर उठाए सवाल

Court Hearing |

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुस्लिमों पर हमले और लिंचिंग की घटनाओं पर स्वतः संज्ञान नहीं लेने को लेकर National Human Rights Commission (एनएचआरसी) की कार्यप्रणाली पर सख्त टिप्पणी की है। यह टिप्पणी यूपी के 588 मदरसों की जांच के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई। साथ ही कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राज्य मानवाधिकार आयोग कोई न्यायाधिकरण नहीं हैं, जो मुकदमों की सुनवाई कर सकें।

सुनवाई के दौरान सख्त रुख

Justice Atul Sreedharan ने याचिका पर सुनवाई करते हुए एनएचआरसी के कामकाज पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि आयोग मुस्लिमों पर हमले और लिंचिंग जैसे मामलों में स्वतः संज्ञान नहीं ले रहा, जबकि ऐसे मामलों में हस्तक्षेप कर रहा है जो पहली नजर में उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं। कोर्ट ने आयोग को नोटिस जारी करते हुए 11 मई 2026 तक जवाब दाखिल करने को कहा है और पहले दिए गए अंतरिम आदेश को अगली तारीख तक जारी रखने का निर्देश दिया।

समाज में बढ़ता डर

हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि अराजक तत्व कानून अपने हाथ में लेकर लोगों को परेशान कर रहे हैं। खासकर अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच संबंधों को निशाना बनाया जा रहा है। कोर्ट ने कहा कि अब अलग धर्म के व्यक्ति के साथ सार्वजनिक स्थान पर बैठकर कॉफी पीना भी डर का कारण बन गया है। ऐसे मामलों में न तो राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और न ही राज्य मानवाधिकार आयोग ने कोई संज्ञान लिया और न ही कार्रवाई की।

आयोग की भूमिका पर सवाल

कोर्ट ने कहा कि आयोग अपना समय ऐसे कानूनी मामलों में लगा रहा है जिन्हें हाईकोर्ट जनहित याचिका के माध्यम से आसानी से सुलझा सकता है। हालांकि, इस मामले की सुनवाई में शामिल Justice Vivek Saran ने आयोग पर की गई टिप्पणियों से असहमति जताई और खुद को इन टिप्पणियों से अलग कर लिया।

क्या है पूरा मामला

दरअसल, टीचर एसोसिएशन मदारिस अरबिया और दो अन्य याचिकाकर्ताओं ने एनएचआरसी के एक आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि प्रदेश में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग की मिलीभगत से 588 मदरसे चल रहे हैं और अनुदान मिलने के बावजूद इनमें मूलभूत सुविधाओं की कमी है। इस शिकायत पर एनएचआरसी ने 28 फरवरी 2025 को आर्थिक अपराध शाखा (EOW) के महानिदेशक को जांच के आदेश दिए थे।

कोर्ट की स्पष्ट टिप्पणी

मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राज्य मानवाधिकार आयोग कोई न्यायाधिकरण नहीं हैं, जो मुकदमों की सुनवाई कर सकें। कोर्ट ने कहा कि यदि आयोग किसी मामले में हस्तक्षेप करना चाहता है, तो उसे स्वयं शिकायतकर्ता बनकर सक्षम अदालत में मामला दायर करना चाहिए।

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