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हिंदू धर्म में बच्चों की मृत्यु पर क्यों दफनाया जाता है? जानिए धार्मिक और आध्यात्मिक कारण

हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद अग्नि संस्कार को आत्मा को शरीर के मोह से मुक्त करने का माध्यम माना जाता है। अग्नि को अत्यंत पवित्र और शुद्धिकरण करने वाला तत्व माना गया है।

हिंदू धर्म में बच्चों की मृत्यु पर क्यों दफनाया जाता है जानिए धार्मिक और आध्यात्मिक कारण

Hindu Traditions: Why Infants Are Buried Instead of Cremated |

जबलपुर (एमपी)। हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद अग्नि संस्कार को आत्मा को शरीर के मोह से मुक्त करने का माध्यम माना जाता है। अग्नि को अत्यंत पवित्र और शुद्धिकरण करने वाला तत्व माना गया है, जो शरीर को पंचतत्वों में विलीन कर आत्मा को आगे की यात्रा के लिए मुक्त करता है। हालांकि, छोटे बच्चों के लिए यह नियम अलग है।

धार्मिक और आध्यात्मिक कारण

गरुड़ पुराण और अन्य शास्त्रों के अनुसार, इसके पीछे मुख्य रूप से 'कर्म' और 'मोह-माया' का तर्क दिया गया है। छोटे बच्चों को 'अति शुद्ध' और 'निष्कपट' माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि एक शिशु ने संसार में आने के बाद न तो कोई पाप किए होते हैं और न ही कोई बुरा कर्म संचित किया होता है। वयस्क जीवन में मनुष्य सांसारिक बंधनों, अहंकार, और इच्छाओं (मैं और मेरा की भावना) से घिर जाता है। दाह संस्कार का उद्देश्य उन संचित बंधनों को अग्नि द्वारा भस्म करना होता है। चूंकि बच्चों में ये सांसारिक भावनाएं और मोह-माया विकसित ही नहीं हुई होती हैं, इसलिए उन्हें अग्नि द्वारा शुद्धिकरण की आवश्यकता नहीं मानी जाती। धर्मग्रंथों में उल्लेख है कि छोटी उम्र के बच्चों की आत्मा पहले से ही सांसारिक बंधनों से मुक्त होती है, इसलिए वे शरीर से बहुत कम जुड़ी होती हैं।

दफनाने का प्रतीकात्मक अर्थ

बच्चों को दफनाने की प्रक्रिया को 'भू-समाधि' भी कहा जाता है। इसके पीछे की भावना यह है कि बच्चा वापस प्रकृति की गोद में समा रहा है। मिट्टी को मां का स्वरूप माना जाता है, और यह माना जाता है कि बच्चा अपनी मां की गोद में सुरक्षित है और शांति से विश्राम कर रहा है।

और किसे दफनाया जाता है

दिलचस्प बात यह है कि केवल बच्चों को ही नहीं, बल्कि साधु-संतों और सन्यासियों को भी जलाने के बजाय दफनाने की परंपरा है। इसके पीछे का कारण यह है कि सन्यासी जीवन भर कठोर तप और साधना के माध्यम से अपनी इंद्रियों और इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। उनका शरीर भी संसार के बंधनों से मुक्त माना जाता है, इसलिए उनका अंतिम संस्कार भी समाधि के रूप में होता है। यह परंपरा मुख्य रूप से लोक मान्यताओं और विभिन्न धर्मग्रंथों (जैसे गरुड़ पुराण) के सिद्धांतों पर आधारित है। समय के साथ, क्षेत्रीय और पारिवारिक रीति-रिवाजों के आधार पर इसमें थोड़े बदलाव हो सकते हैं, लेकिन दफनाने का मूल दर्शन 'पवित्रता' और 'अनासक्ति' ही है।

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