भोपाल। डिजिटल युग में बच्चों का बचपन मोबाइल की स्क्रीन तक सिमट गया है, पर मध्य प्रदेश की राजधानी में...
भोपाल। डिजिटल युग में बच्चों का बचपन मोबाइल की स्क्रीन तक सिमट गया है, पर मध्य प्रदेश की राजधानी में पारंपरिक खिलौनों से 'खोते हुए बचपन' को वापस लाने की एक अनूठी कोशिश की गई है। भोपाल के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय (IGRMS) में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में देशभर के कारीगरों ने अपनी कला और परंपरा की ताकत का प्रदर्शन किया।
नई पीढ़ी को खिलौनों ले रूबरू कराना
इस प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य नई पीढ़ी को उन खिलौनों से रूबरू कराना है जो कभी भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हुआ करते थे। मिट्टी, लकड़ी और कपड़ों से बने इन खिलौनों के माध्यम से कारीगरों ने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि शारीरिक और मानसिक विकास के लिए पारंपरिक खेल कितने आवश्यक हैं।
शिल्पियों का बना संगम
संग्रहालय के परिसर में आयोजित कार्यक्रम में देश के कोने-कोने से आए कारीगरों ने अपने कौशल का प्रदर्शन किया। यहाँ केवल खिलौनों की प्रदर्शनी ही नहीं लगी, बल्कि बच्चों और आगंतुकों को इन खिलौनों के पीछे के इतिहास और इन्हें बनाने की कला के बारे में भी बताया गया।
विलुप्त होती कला को मिला नया जीवन
यह आयोजन समाज के लिए एक महत्वपूर्ण पहल बनकर उभरा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे कार्यक्रमों से न केवल लुप्त हो रही कलाओं को नया जीवन मिलता है, बल्कि बच्चों को गैजेट्स की दुनिया से बाहर निकलकर अपनी जड़ों से जुड़ने का मौका भी मिलता है।
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