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शराब व्यापार मौलिक अधिकार नहीं, निलंबन सही

शराब का व्यापार मौलिक अधिकार नहीं, लाइसेंस निलंबन सही

जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भोपाल की सोम डिस्टलरीज को एक बड़ा झटका देते हुए स्पष्ट किया है कि शराब का व्यापार करना कोई मौलिक अधिकार (Fundamental Right) नहीं है।

शराब का व्यापार मौलिक अधिकार नहीं लाइसेंस निलंबन सही

Madhya Pradesh |

जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भोपाल की सोम डिस्टलरीज को एक बड़ा झटका देते हुए स्पष्ट किया है कि शराब का व्यापार करना कोई मौलिक अधिकार (Fundamental Right) नहीं है। अदालत ने नियमों के उल्लंघन पर आबकारी विभाग द्वारा कंपनी के लाइसेंस निलंबन की कार्रवाई को पूरी तरह उचित ठहराया और कंपनी की याचिका को खारिज कर दिया।

यह था मामला

​याचिकाकर्ता कंपनियों पर जाली और फर्जी परिवहन परमिटों के आधार पर रायसेन से दीव तक शराब भेजने का आरोप था। इस धोखाधड़ी से सरकार को भारी राजस्व का नुकसान हुआ था। आबकारी विभाग ने इस मामले में कार्रवाई करते हुए 4 फरवरी 2026 के आदेश के जरिए सोम डिस्टलरीज की दो कंपनियों के कुल 8 लाइसेंस निलंबित कर दिए थे। यह कार्रवाई 26 फरवरी 2024 को जारी किए गए 'कारण बताओ नोटिस' (Show Cause Notice) के आधार पर की गई थी।

​अदालत ने दिया फैसला

​जस्टिस विवेक अग्रवाल की एकलपीठ ने अपने 32 पन्नों के विस्तृत आदेश में कहा कि ​शराब का व्यवसाय करना नागरिक का मौलिक अधिकार नहीं है। ​यदि नियमों का उल्लंघन होता है, तो लाइसेंस को सस्पेंड या रद्द करना कानूनन सही है। ​विदेशी शराब के परिवहन के लिए फर्जी परमिट का उपयोग करना एक गंभीर धोखाधड़ी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

​अदालत के सामने रखी दलीलें

सोम डिस्टलरीज कंपनी ने तर्क दिया कि जिस नोटिस के आधार पर कार्रवाई हुई वह 2023-24 की अवधि का था, जबकि वह लाइसेंस 31 मार्च 2024 को समाप्त हो चुका था। नए लाइसेंस (2024-25 और 2025-26) के लिए पुराने नोटिस के आधार पर कार्रवाई करना कानून के खिलाफ है। राज्य सरकार सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता हरप्रीत सिंह रूपराह और शासकीय अधिवक्ता मानस मणि वर्मा ने दलील दी कि आबकारी एक्ट के तहत विभाग को कार्रवाई का पूरा अधिकार है और नियमों का पालन करना अनिवार्य है।

कारण बताओं की एक्सपायरी डेट नहीं होती

कोर्ट ने माना कि 'कारण बताओ नोटिस' की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती और देरी से की गई कार्रवाई इसे अवैध नहीं बनाती, खासकर जब मामला गंभीर धोखाधड़ी से जुड़ा हो।

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