सरकार द्वारा जारी एक रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि पिछले 5 वर्षों (2021 से 2025) के दौरान राज्य की लगभग 60 हजार एकड़ वन भूमि को गैर-वन उद्देश्यों के लिए 'डायवर्ट' कर दिया गया है।
जबलपुर/भोपाल। मध्य प्रदेश में विकास की गति तेजी से आगे बढ़ रही है, लेकिन इसकी कीमत राज्य के जंगलों को चुकानी पड़ रही है। हाल ही में सरकार द्वारा जारी एक रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि पिछले 5 वर्षों (2021 से 2025) के दौरान राज्य की लगभग 60 हजार एकड़ वन भूमि को गैर-वन उद्देश्यों के लिए 'डायवर्ट' (हस्तांतरित) कर दिया गया है।
जबलपुर में 5 साल का हाल, खत्म हुआ 200 एकड़ का जंगल
विशेष रूप से जबलपुर वन मंडल की बात करें तो यहाँ पिछले 5 सालों में विभिन्न परियोजनाओं के लिए लगभग 200 एकड़ वन क्षेत्र कम हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, सिंचाई, सड़क चौड़ीकरण और खनन जैसी गतिविधियों के लिए यह भूमि आवंटित की गई थी। इनमें हिरण मध्यम सिंचाई परियोजना में 54.87 हेक्टेयर, एनएच-12ए (जबलपुर-बरेला खंड) में 2.696 हेक्टेयर, खनन एवं अन्य परियोजनाएं में लगभग 8.26 हेक्टेयर, अन्य प्रमुख कार्य में रिंग रोड और कुंडम की झींता खुदरी डैम योजनाएं शामिल हैं।
वन भूमि डायवर्जन में मध्यप्रदेश देश में टॉप
राज्यसभा में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के राज्य मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह ने बताया कि पूरे देश में वन भूमि के हस्तांतरण के मामले में मध्य प्रदेश पहले नंबर पर है। MP में 5 साल में डायवर्ट हुई जमीन 60,000 एकड़ (लगभग 24,346 हेक्टेयर)। भारत में कुल डायवर्जन (2020-25) 97,050 हेक्टेयर हुआ है। सबसे ज्यादा डायवर्जन वाला दूसरा राज्य ओडिशा है। सड़कों के लिए देशभर में ली गई जमीन 22,233 हेक्टेयर है।
प्रशासन ने बताया अपना रूख
जबलपुर के मंडल वन अधिकारी (DFO) राजेंद्र सिंह के अनुसार, विकास परियोजनाओं के लिए वन भूमि का डायवर्जन अनिवार्य होने पर ही किया जाता है। उन्होंने बताया कि इसकी भरपाई के लिए समय-समय पर प्लांटेशन (वृक्षारोपण) भी कराया जाता है ताकि भविष्य में नए जंगल तैयार हो सकें। हालांकि, पर्यावरण प्रेमियों के लिए 60 हजार एकड़ जंगल का कम होना एक गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है।
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