मध्य प्रदेश, देश का सबसे बड़ा गेहूं और दलहन उत्पादक राज्य है। इसलिए इस बार केंद्रीय बजट किसानों की विशेष निगाह में था।
जबलपुर/भोपाल। मध्य प्रदेश, देश का सबसे बड़ा गेहूं और दलहन उत्पादक राज्य है। इसलिए इस बार केंद्रीय बजट किसानों की विशेष निगाह में था। खासकर इसलिए क्योंकि देश के कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान स्वयं मध्य प्रदेश के सीहोर ज़िले से हैं। उपजाऊ काली मिट्टी, सोयाबीन, चना और मसूर की विशाल खेती के लिए प्रसिद्ध यह राज्य उम्मीद कर रहा था कि बजट में किसानों के लिए कुछ ठोस राहत मिलेगी। लेकिन बजट के बाद किसानों में निराशा साफ़ दिख रही है।
मध्यप्रदेश के लिए घोषणएं दूरी की बात
सरकार ने बजट में किसानों के लिए कई घोषणाएँ कीं। जैसे नारियल उत्पादन बढ़ाने के लिए विशेष प्रोत्साहन, वैज्ञानिक चंदन खेती, पहाड़ी इलाकों में बादाम, अखरोट, काजू और कोको जैसी फसलों को बढ़ावा। नारियल उत्पादन को ‘कोकोनट प्रमोशन स्कीम’ के तहत बढ़ाने की बात भी कही गई। काग़ज़ों पर यह बजट विविधता और नवाचार की बात करता है, लेकिन मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में यह सब दूर की बातें लगती हैं। यहाँ की काली मिट्टी सिर्फ़ फसल नहीं उगाती, बल्कि उम्मीदें भी बोती है। यही वजह है कि इस साल का केंद्रीय बजट गांवों में गर्व और अपेक्षा—दोनों के साथ इंतज़ार किया गया।
कासानों की बुनियादी अपेक्षाएं
किसानों की अपेक्षाएँ बहुत बुनियादी थीं। महज न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में बढ़ोतरी, बढ़ती लागत से राहत, फसल बीमा के ज़रिये बेहतर सुरक्षा, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की राशि में बढ़ोतरी। मध्य प्रदेश वही राज्य है जो देश को भोजन देता है। गेहूं और दलहन का सबसे बड़ा उत्पादक। सोयाबीन, चना, मसूर, प्याज़ और लहसुन की धरती। और सबसे खास—शरबती गेहूं, जिसे “सुनहरा दाना” कहा जाता है। किसानों को लगा था कि जो नेता इस मिट्टी को जानता है, वह उनकी भाषा बोलेगा, लेकिन आज किसान खुश नहीं हैं।
सीहोर जिले में 3.5 लाख हेक्टेयर में खेती
सीहोर ज़िले में ही लगभग 3.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खेती होती है, ज़्यादातर सिंचित। खरीफ में सोयाबीन और रबी में गेहूं व चना की खेती होती है। चंदेरी के किसान एम.एस. मेवारा, 75 एकड़ ज़मीन पर खेती करते हैं। कहते हैं, उम्मीदें बहुत बड़ी थीं। गांवों में चर्चा थी कि सोयाबीन का दाम 8,000 रुपये तक जाएगा, गेहूं 5,000 रुपये पार करेगा, प्याज़ को सही संरक्षण मिलेगा और सम्मान निधि बढ़ेगी। लेकिन जो मिला, उसने उन्हें आहत किया। उनका सवाल है—सीहोर का किसान बादाम, काजू या कोको कहां उगाएगा? यह मिट्टी गेहूं और सोयाबीन की है, बाग़ानी फसलों की नहीं। वे कहते हैं कि देश रोज़ गेहूं खाता है, लेकिन किसान को उसका उचित दाम देने को कोई तैयार नहीं।
युवा किसानों में निराशा और गहरी
युवा किसानों में निराशा और गहरी है। 12 एकड़ खेती करने वाले गब्बर मेवारा कहते हैं कि किसानों ने सरकार पर भरोसा किया था—वादों और नारों पर। अब उन्हें लगता है कि उन्हें मदद नहीं, सिर्फ़ चमकदार बातें दी गई हैं। लागत बढ़ती जा रही है—बीज, खाद, डीज़ल—लेकिन आमदनी अनिश्चित बनी हुई है।
उम्मीद थी, फसल बीमा पर मजबूत घोषणा होगी पर नहीं हुआ
उलझावन गांव के प्रेम नारायण मेवारा के पास सिर्फ़ पाँच एकड़ ज़मीन है। ओलावृष्टि ने उनकी पूरी फसल नष्ट कर दी। गांव में अफरा-तफरी मच गई, लेकिन कोई अधिकारी नहीं पहुंचा। न सर्वे हुआ, न मुआवज़े की घोषणा। उन्हें उम्मीद थी कि बजट में कम से कम फसल बीमा को लेकर कोई मज़बूत घोषणा होगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। बजट में तकनीक और भविष्य की बातें की गईं। किसानों के लिए बहुभाषी एआई टूल ‘भारत विस्तार’। छह करोड़ किसानों को डिजिटल रजिस्ट्री में शामिल करना। एक करोड़ किसानों को प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण। भंडारण क्षमता में वृद्धि। मत्स्य और डेयरी क्षेत्र के लिए अधिक फंड। लेकिन गांवों में किसान एक सीधा सवाल पूछ रहे हैं—इस मौसम में हमारे साथ कौन खड़ा होगा?
एमएसपी पर स्पष्ट आश्वासन नहीं, फसल बीमा पर राहत नहीं
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि अब भी 6,000 रुपये सालाना ही है। फसल बीमा में कोई राहत नहीं। और जिन फसलों पर यह राज्य निर्भर है, उनके MSP को लेकर कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं। मध्य प्रदेश गेहूं उत्पादन में पंजाब और हरियाणा को पीछे छोड़ चुका है। चना, मसूर, सोयाबीन और तिलहन में अग्रणी है। देश की लगभग आधी औषधीय फसलें यहीं उगती हैं। मसाले और टमाटर यहां से पूरे देश में जाते हैं। फिर भी आज किसान अपनी ताक़त का जश्न नहीं मना रहे—वे चिंतित और बेचैन हैं।
बजट के बाद किसनों की आवाज थमी है
बजट से पहले किसानों ने उम्मीद की थी कि यह बजट उनका होगा। बजट के बाद उनकी आवाज़ थमी हुई है। खेत अब भी सुनहरे हैं, लेकिन उन्हें सींचने वालों के दिल भारी हैं।
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