इंदौर। मध्य प्रदेश में रसोई गैस (LPG) को लेकर हाहाकार मचा हुआ है। गैस की कमी की अफवाह से डर का माहौल है...
इंदौर। मध्य प्रदेश में रसोई गैस (LPG) को लेकर हाहाकार मचा हुआ है। गैस की कमी की अफवाह से डर का माहौल है। इसी के चलते लोगों ने जरूरत से ज्यादा सिलेंडर बुक करना शुरू कर दिया है। प्रदेश भर में गैस एजेंसियों पर दबाव चरम पर पहुंच गया है। सरकारी स्तर पर कुकिंग के लिए कोयला औऱ वैकल्पिक चीजों को प्रयोग करने की बात कही जा रही है। दवा पर भी असर हो सकता है। विशेषकर जीवन रक्षक दवा की उपलब्ध पर गंभीर असर पड़ने की संभावना है।
सिलेंडर की ऑनलाइन बुकिंग ठप, एजेंसियों के बाहर कतारें
मध्य प्रदेश में इन दिनों एलपीजी सिलेंडर की भारी किल्लत देखने को मिल रही है। सर्वर डाउन होने के कारण ऑनलाइन बुकिंग पूरी तरह से बंद है, जिससे आम जनता को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। सिलेंडर की बुकिंग के लिए वेटिंग पीरियड 7 से 8 दिन तक पहुँच गया है। भोपाल, इंदौर और ग्वालियर जैसे बड़े शहरों में गैस एजेंसियों के बाहर लोगों की लंबी कतारें लगी हुई हैं। प्रदेश के लगभग 50 हजार होटल और रेस्टोरेंट में गैस खत्म होने की कगार पर है, जिससे उनके कामकाज पर बुरा असर पड़ा है।
डिलीवरी में लग रहा है काफी समय
प्रदेश के कई शहरों में सिलेंडर बुक करने के बाद उसकी डिलीवरी मिलने में 4 से 10 दिन तक का समय लग रहा है। आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए नियम कड़े किए गए हैं। अब पिछली डिलीवरी के कम से कम 25 दिन बाद ही नई बुकिंग स्वीकार की जा रही है। मांग बढ़ने का फायदा उठाकर अवैध भंडारण भी शुरू हो गया है। हाल ही में इंदौर में एक अवैध गैस गोदाम पर छापा मारकर 66 सिलेंडर जब्त किए गए हैं।
सप्लाई चेन चरमराई
सामान्य दिनों के मुकाबले गैस सिलेंडरों की बुकिंग में दोगुनी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस अचानक बढ़ी मांग के कारण गैस एजेंसियों का वितरण तंत्र पूरी तरह चरमरा गया है। लोग डर के मारे एडवांस में सिलेंडर स्टॉक करने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे आपूर्ति श्रृंखला (supply chain) बाधित हो रही है।
ऊंचे दाम पर बेच रहे हैं सिंलेंडर
जहाँ एक ओर लोग डिलीवरी के लिए हफ़्तों इंतज़ार कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कालाबाजारी के मामले भी सामने आने लगे हैं। प्रशासन अब ऐसे अवैध गोदामों और बिचौलियों पर नजर रख रहा है जो इस कृत्रिम किल्लत का फायदा उठाकर ऊंचे दामों पर सिलेंडर बेच रहे हैं। अगली बुकिंग के लिए पिछली डिलीवरी से 25 दिनों का अंतराल रखना अनिवार्य हो गया है।
मुख्यमंत्री ने कहा, चिंता की जरूरत नहीं
मप्र के मुख्यमंत्री ने कहा कि रसोई गैस की कोई कमी नहीं है और उपभोक्ताओं को एलपीजी, पीएनजी और सीएनजी की आपूर्ति लगातार जारी रहेगी। उन्होंने कहा कि मध्य पूर्व में युद्ध जैसी स्थितियों के बीच केंद्र और राज्य सरकार पूरी तरह सतर्क हैं और नागरिकों को चिंता करने की जरूरत नहीं है।
सरकार कर रही है वैकल्पिक व्यवस्था
मुख्यमंत्री ने बताया कि पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति को सुचारु बनाए रखने के लिए केंद्र सरकार ने कई वैकल्पिक व्यवस्थाएं की हैं। पहले अधिकतर कच्चे तेल की आपूर्ति स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते होती थी, लेकिन अब अन्य स्रोतों से भी आपूर्ति सुनिश्चित की जा रही है। देश की रिफाइनरियां भी उच्च क्षमता पर काम कर रही हैं और एलपीजी उत्पादन बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं। इससे गैस उत्पादन में करीब 25 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है।
सरकार का प्लान-बी के तहत केरोसिन और कोयले को बढ़ावा
रसोई गैस की बढ़ती किल्लत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गहराते ऊर्जा संकट को देखते हुए भारत सरकार ने अपना 'प्लान-बी' तैयार कर लिया है। एलपीजी की भारी कमी को दूर करने के लिए सरकार अब ईंधन के पारंपरिक विकल्पों जैसे केरोसिन (मिट्टी का तेल) और कोयले के उपयोग को बढ़ावा देने पर विचार कर रही है।
यह है नई रणनीति
केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने लोकसभा में जानकारी दी कि मौजूदा एलपीजी गैस चैनलों पर पड़ रहे भारी दबाव को कम करने के लिए सरकार अब ईंधन के अन्य विकल्पों पर ध्यान केंद्रित कर रही है।
इसलिए आई यह नौबत
पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव और युद्ध की स्थिति ने एलपीजी की सप्लाई चेन को बाधित कर दिया है। चूंकि भारत अपनी गैस जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आपूर्ति रुकने से घरेलू बाजार में सिलेंडर की भारी किल्लत हो गई है। इसी दबाव को कम करने के लिए सरकार अब ईंधन के उन पुराने विकल्पों की ओर लौट रही है जिन्हें धीरे-धीरे कम किया जा रहा था।
उज्जवला योजना से चुनौतियां भी
सरकार का यह 'प्लान-बी' उन क्षेत्रों के लिए राहत की बात हो सकती है जहाँ गैस सिलेंडरों की डिलीवरी में हफ़्तों की देरी हो रही है। हालांकि, कोयले और केरोसिन के बढ़ते इस्तेमाल से पर्यावरण और उज्ज्वला योजना जैसी स्वच्छ ईंधन मुहिमों के सामने चुनौतियां भी पैदा हो सकती हैं।
महंगी होने वाली हैं दवाइयां
मध्य पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव और युद्ध की स्थितियों ने अब दुनिया भर के बाजारों के साथ-साथ भारत के दवा उद्योग की भी चिंता बढ़ा दी है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, इस संकट के कारण आने वाले दिनों में जरूरी दवाइयों की किल्लत हो सकती है या उनकी कीमतों में भारी उछाल आ सकता है।
कच्चे माल की कमी
भारतीय दवा कंपनियां दवा बनाने के लिए जरूरी कच्चे माल (APIs और सोल्वेंट्स) के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर हैं। युद्ध के कारण समुद्री रास्तों में रुकावट आने से चीन और अन्य देशों से आने वाले कच्चे माल की सप्लाई प्रभावित हुई है।
लागत में 30% तक की बढ़ोत्तरी संभव
पेट्रोलियम आधारित सोल्वेंट्स और अन्य इनपुट्स की कीमतें पिछले कुछ दिनों में 20% से 30% तक बढ़ गई हैं। इसके अलावा, समुद्री माल ढुलाई (Freight Charges) के दाम भी लगभग दोगुने हो गए हैं।
दवा कंपनियों की मांग
बढ़ती उत्पादन लागत को देखते हुए, फार्मा कंपनियों ने सरकार से दवाइयों की कीमतें बढ़ाने की अनुमति मांगी है। उनका कहना है कि मौजूदा कीमतों पर दवा बनाना अब घाटे का सौदा साबित हो रहा है।
क्या है NPPA की भूमिका?
देश में दवाओं की कीमतों को NPPA (National Pharmaceutical Pricing Authority) नियंत्रित करता है। कंपनियां अब नियामक पर दबाव बना रही हैं कि उन्हें इन असाधारण परिस्थितियों में कीमतों में संशोधन करने की अनुमति दी जाए।
क्या 15 दिन बाद दवाइयां नहीं मिलेंगी?
अधिकांश दवा कंपनियों के पास 10 से 15 दिनों का ही 'जस्ट-इन-टाइम' स्टॉक बचा है। अगर युद्ध की स्थिति जल्द नहीं सुधरती और सप्लाई चेन बहाल नहीं होती, तो बाजार में जीवन रक्षक दवाओं की उपलब्धता पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।
सरकार का हस्तक्षेप जरूरी
यह स्थिति आम आदमी की जेब पर सीधा असर डाल सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार ने हस्तक्षेप नहीं किया, तो ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और एंटीबायोटिक्स जैसी जरूरी दवाएं महंगी हो सकती है।
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