उत्तर प्रदेश में भूजल के अवैध दोहन के बढ़ते मामलों को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने गंभीर चिंता जाहिर किया है।
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में भूजल के अवैध दोहन के बढ़ते मामलों को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने गंभीर चिंता जाहिर करते हुए सरकार के संबंधित प्राकिरणों को भूजल दोहन के आकलन और जल ऑडिट से संबंधित कड़े निर्देश जारी किए हैं।
बिना अनुमति पानी उपयोग करने वालों पर कार्रवाई तय
न्यायाधिकरण ने इस मामले में सख्त रूख अख्तियार करते हुए यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को नोटिस जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि बिना पूर्व अनुमति के भूजल का उपयोग नहीं किया जा सकता। ऐसा करने वाले प्रतिष्ठानों के खिलाफ सख्त कार्यवाही (जल ऑडिट और क्षतिपूर्ति आकलन) की जाएगी।
महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई, अगली तारीख 16 जुलाई 2026
एनजीटी के चेयरमैन और न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव की अध्यक्षता वाली पीठ ने महेश चंद्र सक्सेना बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य और विक्रांत टोंगड़ बनाम भारत संघ एवं अन्य के मामले में सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है। पीठ में विशेषज्ञ सदस्य डॉ. ए. सेंथिल वेल और डॉ. अफरोज अहमद भी शामिल थे। मामले की अगली सुनवाई 16 जुलाई 2026 को निर्धारित की गई है।
पुराने आदेशों के अनुपालन में लापरवाही उजागर
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने उत्तर प्रदेश में अवैध भूजल दोहन के बढ़ते मामलों पर सख्त रुख अपनाते हुए राज्य की एजेंसियों को कड़े निर्देश जारी किए हैं। पीठ ने भूजल दोहन के आकलन एवं पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति से संबंधित अपने पूर्व आदेशों के अनुपालन पर जोर दिया। सुनवाई के दौरान यह पाया गया कि 19 जून 2020 के आदेश विशेषकर अवैध भूजल दोहन के आकलन और जल ऑडिट से संबंधित निर्देश का पूर्ण अनुपालन नहीं हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी निर्देश प्रभावी
अधिकरण ने यह भी स्पष्ट किया कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 26 मार्च 2025 के आदेश में इन निर्देशों में कोई संशोधन नहीं किया गया है, अतः यह प्रभावी हैं। अधिकरण ने दोबारा निर्देशित किया है कि भूजल दोहन का यथार्थ आकलन किया जाए। अधिकरण ने कहा है कि भूजल के अवैध उपयोग पर सख्ती से कार्रवाई की जाए और पहले दिए गए सभी आदेशों का पूरी तरह पालन सुनिश्चित किया जाए। साथ ही यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को नोडल एजेंसी बनाते हुए छह सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा गया है। अधिकरण ने पूर्व में गठित संयुक्त समिति में सीपीसीबी और आईआईटी दिल्ली के अतिरिक्त प्रतिनिधियों को शामिल करने का निर्देश दिया है। पूर्व में गठित संयुक्त समिति में राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, जिला मजिस्ट्रेट गौतम बुद्ध नगर, नोएडा प्राधिकरण तथा केंद्रीय भूजल प्राधिकरण शामिल हैं। मामले की अगली सुनवाई 16 जुलाई 2026 को होगी।
जल ऑडिट और मीटरिंग की अनिवार्यता पर जोर
सुनवाई के दौरान एनजीटी ने पाया कि 19 जून 2020 को जल ऑडिट और भूजल दोहन के आकलन को लेकर दिए गए निर्देशों का अभी तक पूरा पालन नहीं हुआ है। अधिकरण ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट के 26 मार्च 2025 के आदेश के बाद भी पुराने निर्देश प्रभावी हैं और उन्हें लागू करना अनिवार्य है। एनजीटी ने राज्य की संबंधित एजेंसियों को निर्देश दिया कि प्रदेश में भूजल दोहन का सही आकलन किया जाए। जहां जल मीटर नहीं लगे हैं, वहां अनुमान के आधार पर कार्रवाई की जाए। साथ ही पिछले तीन वर्षों में भूजल के उपयोग और उसके पुनर्भरण का जल ऑडिट कराया जाए।
पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति और रेनवॉटर सिस्टम की जांच के निर्देश
अधिकरण ने यह भी कहा कि अवैध रूप से भूजल का इस्तेमाल करने वालों से पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति वसूली जाए। इसके अलावा वर्षा जल संचयन प्रणालियों की गुणवत्ता की जांच कर आवश्यक सुधार किए जाएं। मामले की जांच के लिए गठित संयुक्त समिति में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और आईआईटी दिल्ली के विशेषज्ञों को भी शामिल किया गया है, ताकि जांच अधिक प्रभावी ढंग से हो सके।
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