सहकारी समितियों और अन्य सरकारी अनुदानप्राप्त संस्थाओं में जिला अधिकारियों की पत्नियों को पदेन पदाधिकारी बनाए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराते हुए से औपनिवेशिक मानसिकता बताया है।
सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, सहकारी समितियों में डीएम की पत्नी पदाधिकारी कैसे
अदालत ने कहा यह औपनिवेशिक मानसिकता
नई दिल्ली।
उत्तर प्रदेश में सहकारी समितियों और अन्य सरकारी अनुदानप्राप्त संस्थाओं में जिला अधिकारियों की पत्नियों को पदेन पदाधिकारी बनाए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराते हुए से औपनिवेशिक मानसिकता करार दिया है। राज्य की योगी सरकार ने इस मामले में कोर्ट को बताया कि 1860 के पंजीकरण अधिनियम को बदलने के लिए नया विधेयक तैयार किया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने यूपी की सहकारी समितियों और अन्य सरकारी अनुदानप्राप्त संस्थाओं में जिला अधिकारियों की पत्नियों को पदेन पदाधिकारी बनाए जानें को औपनिवेशिक मानसिकता करार दिया और राज्य सरकार को फटकार लगाई। इस परंपरा को आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था के विपरीत बताते हुए शीर्ष अदालत ने सरकार को दो महीने के भीतर संबंधित कानूनों को संशोधित करने का निर्देश दिया।
मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत व जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ बुलंदशहर की सीएम जिला महिला समिति की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में समितियों में जिला अधिकारी की पत्नी को पदेन अध्यक्ष बनाने की प्रथा को चुनौती दी है। सुनवाई के दौरान पीठ ने पूछा, जिला अधिकारी की पत्नी को किसी समिति का अध्यक्ष स्वतः कैसे बनाया जा सकता है? लोकतंत्र में पदों पर चयन चुनाव से होना चाहिए, अधिकारी के रिश्ते से नहीं। पीठ ने टिप्पणी की कि यह व्यवस्था ऐसे प्रतीत होती है जैसे सत्ता कलेक्टर की पत्नी के हाथों में धूल झाड़कर सौंप दी गई हो।
मालूम हो कि आकांक्षा समितियों और कुछ अन्य समितियों में जिलास्तर पर डीएम की पत्नी पदेन अध्यक्ष होती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसे लेकर राज्य सरकार की खिंचाई की है। याचिका पर सुनवाई के दौरान यूपी की योगी सरकार ने कोर्ट को बताया कि 1860 के पंजीकरण अधिनियम को बदलने के लिए नया विधेयक तैयार किया जा रहा है। सरकार ने इसके लिए जनवरी तक का समय मांगा।
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