अनूपपुर। देश में दशहरे के दिन रावण के पुतले का दहन कर 'अधर्म पर धर्म की जीत' का पर्व मनाया जाता है, वहीं मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले का देवरी गांव एक अलग परंपरा है।
अनूपपुर। देश में दशहरे के दिन रावण के पुतले का दहन कर 'अधर्म पर धर्म की जीत' का पर्व मनाया जाता है, वहीं मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले का देवरी गांव एक अलग परंपरा है। यहाँ के आदिवासी गोंड समुदाय दशकों से रावण को अपना पूर्वज मानता आ रहा है और उनकी पूजा करता है।
रावण के वंशज अराध्य
देवरी गांव के ग्रामीणों का मानना है कि रावण उनके वंशज और आराध्य हैं। वे रावण को एक महान विद्वान और रक्षक के रूप में देखते हैं।
बलिदान दिवस मनाते हैं
इस अवसर पर आदिवासी समुदाय 'बलिदान दिवस' मनाता है। ग्रामीण रावण की प्रतिमा या चित्र के समक्ष एकत्रित होकर अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं। चैत्र शुक्ल चतुर्दशी के खास मौके पर गांव के 'शंकर चबूतरा' पर भारी संख्या में लोग इकट्ठा होते हैं। यहाँ रावण को "पुलस्त्यवंशीय सच्चे गौरक्षक और असुर प्रतिपालक महाराजा रावण" के रूप में संबोधित किया जाता है।
इसलिए करते हैं अराधना
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह परंपरा उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही है। वे रावण को जलाने को अपने पूर्वजों का अपमान मानते हैं, इसलिए वे दहन के बजाय उनकी आराधना करते हैं।
पौराणिक कथा में कई मान्यताएं
यह घटना दर्शाती है कि भारत के विभिन्न हिस्सों में पौराणिक कथाओं और पात्रों को लेकर कितनी विविधतापूर्ण मान्यताएं हैं। जहाँ मुख्यधारा की संस्कृति में रावण को नकारात्मक माना जाता है, वहीं कई आदिवासी समुदायों में उन्हें उनकी बुद्धिमानी, शिव-भक्ति और वंशानुगत गौरव के लिए पूजा जाता है।
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