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मानवाधिकारों के हनन पर पाकिस्तान को घेरा

आर्थिक विकास बनाम मानवाधिकार: UNHRC में पाकिस्तान पर उठे गंभीर सवाल

तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं, विशेष रूप से पाकिस्तान में मानवाधिकारों की चिंता पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के 61वें सत्र के दौरान एक कड़ी समीक्षा हुई।

आर्थिक विकास बनाम मानवाधिकार unhrc में पाकिस्तान पर उठे गंभीर सवाल

Human Rights Concerns Rise Amid Economic Growth Focus at UNHRC |

जिनेवा (स्विट्जरलैंड)। तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं, विशेष रूप से पाकिस्तान में मानवाधिकारों की चिंता पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के 61वें सत्र के दौरान एक कड़ी समीक्षा हुई। जेनेवा के पैलेस डेस नेशंस में "आर्थिक विकास और मानवाधिकारों का अभाव" विषय पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया।

चर्चा में वैश्विक विशेषज्ञों ने लिया हिस्सा

'इंटरनेशनल करियर सपोर्ट एसोसिएशन' द्वारा आयोजित इस चर्चा में वैश्विक विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। उन्होंने इस बात पर गौर किया कि कैसे एशियाई देशों में तेज़ आर्थिक प्रगति अक्सर मानवाधिकारों के उल्लंघन को पीछे छोड़ देती है। वक्ताओं ने मज़दूरों के अधिकारों का हनन, अभिव्यक्ति की आज़ादी पर रोक और उन विकास नीतियों के सामाजिक परिणामों पर बात की जो नागरिकों के कल्याण को प्राथमिकता नहीं देतीं।

पाकिस्तान की स्थिति पर कड़ी आलोचना

जापानी मानवाधिकार कार्यकर्ता शुन फुजिकी ने पाकिस्तान के रिकॉर्ड की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि लगभग 27 अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार सम्मेलनों से बंधे होने के बावजूद, पाकिस्तान में गंभीर उल्लंघन जारी हैं। उन्होंने जबरन गायब किए जाने, प्रताड़ना और हत्याओं की रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि कई नागरिक या तो देश छोड़ रहे हैं या डर के साये में जी रहे हैं। फुजिकी ने ज़ोर देकर कहा कि उनका उद्देश्य पाकिस्तान को अलग-थलग करना नहीं है, बल्कि देश को GSP+ जैसे व्यापारिक लाभ बनाए रखने के लिए वैश्विक मानकों का पालन करना चाहिए।

लोकतंत्र और स्थिरता का संबंध

बांग्लादेश के पूर्व सांसद डॉ. मुहम्मद हबीबे मिल्लत ने कहा कि लोकतांत्रिक और नागरिक स्वतंत्रता के बिना आर्थिक विकास टिकाऊ नहीं है। बांग्लादेश का उदाहरण देते हुए उन्होंने तर्क दिया कि स्थिरता, समृद्धि और जनता की संतुष्टि के लिए लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार बहाल करना ज़रूरी है।

सिंध और संसाधनों का मुद्दा

'वर्ल्ड सिंधी कांग्रेस' के अध्यक्ष डॉ. लाखू लुहाना ने पाकिस्तान, विशेषकर सिंध में बढ़ती गरीबी और असमानता पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि संसाधन संपन्न होने के बावजूद, इस क्षेत्र में गरीबी बढ़ी है, जिसका कारण पर्यावरण का गिरता स्तर और बेरोज़गारी है। लुहाना ने यूरोपीय संघ जैसे अंतरराष्ट्रीय हितधारकों की भूमिका पर सवाल उठाया और पूछा कि क्या उनकी नीतियां वास्तव में मानवाधिकारों को बढ़ावा देती हैं या अनजाने में दमनकारी प्रणालियों का समर्थन करती हैं।

निष्कर्ष

चर्चा का समापन इस सहमति के साथ हुआ कि आर्थिक विकास और मानवाधिकारों के बीच की खाई को पाटना एक बड़ी वैश्विक चुनौती है। विशेषज्ञों ने अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही और सहयोग बढ़ाने का आह्वान किया ताकि विकास को केवल आर्थिक आंकड़ों में नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा की सुरक्षा से मापा जा सके।

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