अमेरिका के कंजर्वेटिव कमेंटेटर टकर कार्लसन ने दावा किया है कि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर ईरान के खिलाफ परमाणु हमले पर विचार करने का दबाव बना रहे हैं।
Tucker Carlson Claims Netanyahu Is Pressuring Trump to Attack Iran with Nuclear Weapons |
वॉशिंगटन DC (अमेरिका): अमेरिका के कंजर्वेटिव कमेंटेटर टकर कार्लसन ने दावा किया है कि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर ईरान के खिलाफ परमाणु हमले पर विचार करने का दबाव बना रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि मध्य ईरान में स्थित पिकैक्स माउंटेन पर संदिग्ध भूमिगत परमाणु केंद्र इस हमले का संभावित निशाना हो सकता है।
नेतन्याहू परमाणु हमले के लिए बना रहे दबाव: कार्लसन
रविवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक लंबी पोस्ट में कार्लसन ने दावा किया कि ट्रंप प्रशासन ईरान पर परमाणु हमला करने के फैसले से कुछ ही दिन दूर हो सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि नेतन्याहू कूटनीतिक समझौते के बजाय तेहरान के खिलाफ सैन्य अभियान दोबारा शुरू करने के लिए वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारियों पर दबाव बना रहे हैं। कार्लसन ने लिखा, "इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के दबाव में ट्रंप प्रशासन ईरान पर परमाणु हमला करने से कुछ ही दिन दूर हो सकता है। निशाना मध्य ईरान में पिकैक्स माउंटेन होगा, जहां इजरायली खुफिया एजेंसी का दावा है कि ईरानी सरकार ने अपना परमाणु संवर्धन कार्यक्रम फिर से शुरू कर दिया है।" उन्होंने आगे दावा किया कि अमेरिका के पारंपरिक हथियार भूमिगत परमाणु केंद्र तक पहुंचने में सक्षम नहीं होंगे। कार्लसन के मुताबिक, "अमेरिकी हथियारों के जखीरे में कोई भी पारंपरिक हथियार 300 फीट ठोस ग्रेनाइट के नीचे बनी उन सुरंगों को नष्ट नहीं कर सकता, जहां परमाणु संवर्धन किया जा रहा है। एकमात्र सैन्य विकल्प परमाणु हमला है। नेतन्याहू इसके लिए काफी दबाव बना रहे हैं।" उन्होंने एक जानकार व्यक्ति के हवाले से कहा, "बीबी हर दिन ट्रंप को इस बारे में फोन करती हैं।"
नेतन्याहू के राजनीतिक हालात को लेकर भी किया दावा
कार्लसन ने आरोप लगाया कि इजरायल में नेतन्याहू के घरेलू राजनीतिक हालात भी ईरान को लेकर उनके रुख को प्रभावित कर रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि इजरायली प्रधानमंत्री अपनी सरकार बचाने के लिए ट्रंप का समर्थन चाहते हैं। उन्होंने लिखा, "नेतन्याहू घिरे हुए हैं और हताश हैं। पिछले हफ्ते के चुनाव नतीजों के बाद वह तब तक सरकार नहीं बना सकते, जब तक ट्रंप सीधे इजरायली राजनीति में दखल देकर दूसरी पार्टियों के साथ ऐसा समझौता नहीं कराते, जिससे नेतन्याहू को नेसेट में 61 सीटें मिल सकें। अन्यथा उन्हें प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ सकता है और जांच या जेल का सामना करना पड़ सकता है। नेतन्याहू को ट्रंप के करीब रहना होगा। उन्हें इस युद्ध की जरूरत है।"
अमेरिकी अधिकारियों पर भी दबाव डालने का आरोप
कमेंटेटर ने दावा किया कि नेतन्याहू अमेरिकी प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों पर भी दबाव बना रहे हैं। इनमें अमेरिकी युद्ध सचिव पीट हेगसेथ और सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के कमांडर एडमिरल ब्रैड कूपर शामिल हैं। कार्लसन ने आरोप लगाया कि दोनों अधिकारी बातचीत के जरिए समझौते के विरोध में थे और बड़े सैन्य अभियान दोबारा शुरू करने के पक्ष में थे। उन्होंने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और CIA निदेशक जॉन रैटक्लिफ का भी नाम लिया। कार्लसन के मुताबिक, ये अधिकारी नेतन्याहू की मांगों का समर्थन कर रहे थे। उन्होंने यह भी दावा किया कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने हाल ही में हुई एक बैठक में प्रस्तावित ईरान शांति समझौते का विरोध किया था।
परमाणु हमले से खाड़ी देशों और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर की आशंका
कार्लसन ने अपनी पोस्ट में चेतावनी दी कि ईरान के खिलाफ नए सैन्य अभियान, खासकर परमाणु हमले के मिडिल ईस्ट और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं। उन्होंने दावा किया कि खाड़ी देश क्षेत्र में दोबारा युद्ध शुरू होने की आशंका को लेकर चिंतित हैं। उनके मुताबिक, संयुक्त अरब अमीरात ने ईरान पर एक और हमले के लिए नेतन्याहू की कथित कोशिश में शामिल होने से इनकार कर दिया है। उन्होंने वैश्विक ऊर्जा और उर्वरक बाजार पर भी संभावित असर की बात कही। कार्लसन ने आशंका जताई कि होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल टैंकरों को नुकसान पहुंचने से आर्थिक मुश्किलें बढ़ सकती हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि पिकैक्स माउंटेन पर परमाणु हमला फारस की खाड़ी को दूषित कर सकता है, जिससे लाखों लोगों की जल आपूर्ति प्रभावित होने का खतरा है। कार्लसन ने चेतावनी दी कि ईरान के खिलाफ अमेरिकी परमाणु हमला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खतरनाक मिसाल कायम कर सकता है। इससे दूसरे देश भी परमाणु हथियारों के इस्तेमाल पर विचार करने के लिए प्रेरित हो सकते हैं।
ट्रंप के परमाणु सिद्धांत में बदलाव का भी लगाया आरोप
कार्लसन ने आगे आरोप लगाया कि ट्रंप प्रशासन फरवरी से अमेरिका के परमाणु सिद्धांत में बदलाव कर रहा है, ताकि युद्ध के मैदान में सीमित परमाणु हथियारों यानी 'बैटलफील्ड न्यूक्स' के पहले इस्तेमाल का रास्ता आसान बनाया जा सके। उन्होंने दावा किया कि ट्रंप 7 नवंबर तक परमाणु हथियारों के संभावित इस्तेमाल पर फैसला ले सकते हैं। हालांकि, उनके मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति अभी भी कूटनीतिक विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। कार्लसन ने लिखा, "करीबी जानकारों का कहना है कि ट्रंप अगले वीकेंड तक यह तय कर सकते हैं कि परमाणु हथियार इस्तेमाल करने हैं या नहीं। यह 7 नवंबर को होगा, यानी अब से छह दिन बाद। उनकी तारीफ करनी होगी कि वह हिचकिचा रहे हैं।" उन्होंने कहा कि ट्रंप उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और अमेरिकी राजदूत स्टीव विटकॉफ की बातें भी सुन रहे हैं। कार्लसन के मुताबिक, दोनों ईरान के साथ बातचीत के जरिए समझौते के पक्ष में हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि ईरान के फैसले लेने वाले लोगों को जानने वाले कुछ लोगों का मानना है कि आगे का संघर्ष नुकसानदायक होगा और बातचीत से समझौता करना बेहतर विकल्प है।
मिडटर्म चुनाव के बाद सैन्य कार्रवाई पर चर्चा की खबरें
कार्लसन के ये दावे अमेरिका के मिडटर्म चुनावों के बाद ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान दोबारा शुरू करने की संभावना को लेकर नेतन्याहू और ट्रंप के बीच बातचीत की खबरों के बीच सामने आए हैं। एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू ने ट्रंप से मंगलवार को होने वाले अमेरिकी मिडटर्म चुनावों के तुरंत बाद ईरान के खिलाफ नए सैन्य हमले करने की अपील की है। वहीं, इजरायल को चिंता है कि वॉशिंगटन तेहरान के साथ कूटनीतिक समाधान की दिशा में आगे बढ़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप और नेतन्याहू ने शनिवार को फोन पर बातचीत की थी। इस दौरान दोनों नेताओं ने ईरान के साथ अमेरिका की बातचीत में हुई प्रगति और सैन्य अभियान दोबारा शुरू करने की संभावनाओं पर चर्चा की। एक इजरायली सूत्र ने इस बातचीत को 'कठिन' बताया, जबकि एक अमेरिकी सूत्र ने इसे 'सीधी बातचीत' करार दिया। एक्सियोस के मुताबिक, नेतन्याहू मिडटर्म चुनावों के बाद नई सैन्य कार्रवाई पर जोर दे रहे हैं, जबकि ट्रंप चाहते हैं कि तेहरान के साथ बातचीत जारी रहे। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ट्रंप कूटनीतिक और सैन्य, दोनों तरह की रणनीति पर काम कर रहे हैं। उनका लक्ष्य एक ओर शांति वार्ता फिर से शुरू करने के लिए समझौता करना है, वहीं दूसरी ओर चुनाव के बाद बड़े सैन्य अभियान दोबारा शुरू करने की तैयारी भी जारी रखना है।
(ANI)
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