हेल्थकेयर और फार्मा शेयरों में दबाव देखने को मिला है। निफ्टी हेल्थकेयर इंडेक्स 2.57 प्रतिशत गिरा, जबकि फोर्टिस हेल्थकेयर, अपोलो हॉस्पिटल्स और मैक्स हेल्थकेयर समेत कई प्रमुख शेयरों में गिरावट दर्ज हुई।
मुंबई: बुधवार को स्वास्थ्य सेवा और दवा कंपनियों के शेयरों पर दबाव देखने को मिला। निफ्टी हेल्थकेयर इंडेक्स 424.90 अंक या 2.57 प्रतिशत गिरकर 16,137.75 पर आ गया। यह गिरावट सुप्रीम कोर्ट द्वारा खुदरा विक्रेताओं से ली जाने वाली कीमतों और उपभोक्ताओं द्वारा दवाओं के लिए भुगतान की जाने वाली कीमतों के बीच व्यापक अंतर पर सवाल उठाने के एक दिन बाद हुई। स्वास्थ्य सेवा सूचकांक में व्यापक गिरावट दर्ज की गई, जिसमें शामिल 20 में से 19 शेयर लाल निशान में कारोबार कर रहे थे। लॉरस लैब्स एकमात्र ऐसा शेयर था जिसमें 0.05 प्रतिशत की बढ़त देखी गई।
फोर्टिस, अपोलो समेत प्रमुख हेल्थकेयर शेयरों में गिरावट
प्रमुख रूप से गिरने वाले शेयरों में फोर्टिस हेल्थकेयर 6.33 प्रतिशत, अपोलो हॉस्पिटल्स 5.70 प्रतिशत और मैक्स हेल्थकेयर 5.33 प्रतिशत गिर गया। ग्लेनमार्क फार्मास्युटिकल्स 4.37 प्रतिशत नीचे रहा। अन्य प्रमुख दवा कंपनियों के शेयरों में भी गिरावट देखी गई। ज़ाइडस लाइफ़साइंसेज के शेयरों में 3.21 प्रतिशत, केआईएमएस के शेयरों में 3.23 प्रतिशत, सन फार्मा के शेयरों में 2.60 प्रतिशत, सिप्ला के शेयरों में 2.41 प्रतिशत, टॉरेंट फार्मा के शेयरों में 1.92 प्रतिशत और बायोकॉन के शेयरों में 1.78 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।
सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की MRP सीमा पर केंद्र से मांगा जवाब
यह व्यापक गिरावट मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार से पूछे गए उस प्रश्न के बाद आई है, जिसमें कहा गया था कि क्या दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की खुदरा कीमतों पर एक समान सीमा लगाई जानी चाहिए ताकि खुदरा विक्रेताओं से ली जाने वाली कीमत पर अत्यधिक मुनाफाखोरी को रोका जा सके। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने सवाल उठाया कि अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) को खुदरा विक्रेता को दी जाने वाली कीमत (पीटीआर) से 16 प्रतिशत अधिक तक सीमित क्यों नहीं किया जा सकता, खासकर जीवन रक्षक दवाओं के मामले में।
दवाओं की कीमतों में बड़े अंतर पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता
अदालत ने खुदरा विक्रेताओं को आपूर्ति की जाने वाली दवाओं की कीमत और उपभोक्ताओं को बेची जाने वाली अधिकतम कीमत के बीच व्यापक अंतर पर भी चिंता व्यक्त की। न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने कैंसर की एक दवा का उदाहरण दिया, जिसकी कीमत उपभोक्ताओं के लिए लगभग 27,000 रुपये है, जबकि खुदरा विक्रेताओं के लिए इसकी कीमत लगभग 3,000 रुपये है। उन्होंने कहा कि इस असमानता की जांच आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट ने औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 के तहत गैर-अनुसूचित दवाओं को मूल्य नियंत्रण व्यवस्था से बाहर रखने के औचित्य पर भी सवाल उठाया।
दवाओं की कीमतों से सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं पर असर की चिंता
पीठ ने आगे कहा कि आयुष्मान भारत जैसी सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के तहत मरीजों के इलाज के दौरान दवाओं की ऊंची कीमतों का असर सार्वजनिक धन पर पड़ सकता है, खासकर तब जब अस्पतालों को अपनी फार्मेसियों से दवाएं खरीदनी पड़ती हैं। केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए मुद्दों को ध्यान में रखते हुए कहा कि एक संतुलन बनाना होगा। इस मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को होगी।
(इनपुट: ANI)
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