अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति वर्ग के किसी व्यक्ति को सिर्फ इस आधार पर किसी के खिलाफ एससी- एसटी ऐक्ट में मुकदमा दर्ज कराने का अधिकार नहीं।
एससी-एसटी होने मात्र से स्पेशल कोर्ट FIR दर्ज करने को बाध्य नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
FIR से पहले प्रथमदृष्टया अपराध व जाति-आधारित मंशा की जांच जरूरी
प्रयागराज।
अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति वर्ग के किसी व्यक्ति को सिर्फ इस आधार पर किसी के खिलाफ एससी- एसटी ऐक्ट में मुकदमा दर्ज कराने का अधिकार नहीं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह आदेश देते हुए इस संबध में दायर अपील खारिज कर दी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल पीड़ित के अनुसूचित जाति (SC) या अनुसूचित जनजाति (ST) समुदाय से होने मात्र से स्पेशल कोर्ट या मजिस्ट्रेट BNSS की धारा 173(4) के तहत प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने का आदेश देने के लिए बाध्य नहीं हैं। न्यायालय ने कुसुम कन्नौजिया बनाम यूपी राज्य (2026) मामले में, न्यायधीश अनिल कुमार दशम ने कहा कि FIR से पहले प्रथम दृष्टया (prima facie) अपराध और जाति-आधारित मंशा की जांच जरूरी है, अन्यथा सीधे FIR नहीं की जा सकती। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अनिल कुमार-दशम की एकल पीठ ने आजमगढ़ निवासी कुसुम कनौजिया की आपराधिक अपील खारिज करते हुए की।
लाइव लाॅ की रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने कहा कि इस तरह के मामलों में, अदालत को सामग्री की जांच करनी चाहिए और यह निर्धारित करना चाहिए कि क्या कथित कृत्य वास्तव में एससी/एसटी अधिनियम के अंतर्गत आता है।
दरअसल आजमगढ़ निवासी कुसुम कनौजिया ने पवन चौबे और चार अन्य के खिलाफ बरदह थाने में एससी- एसटी ऐक्ट में मुकदमा लिखाया था। प्रशासन ने मुकदमा लिखने से इन्कार कर दिया था। इसके बाद याची कुसुम कनौजिया ने पवन चौबे और चार अन्य के खिलाफ बरदह थाने में दर्ज मामले में विशेष न्यायाधीश (एससी-एसटी अधिनियम) की ओर से 19 जनवरी 2026 को पारित आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसका आवेदन खारिज कर दिया गया था।
मामले में राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि एससी-एसटी एक्ट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो विशेष अदालत को आवेदन पर जांच करने से रोकता हो। अदालत ने दो बिंदुओं पर विचार किया। पहला, क्या विशेष अदालत को एससी-एसटी एक्ट के तहत आवेदन पर जांच का अधिकार है। दूसरा, क्या ट्रायल कोर्ट का निर्णय सही है।
इस मामले की सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि कानून के तहत मजिस्ट्रेट के पास यह अधिकार है कि आवेदन आने पर उसे रिकॉर्ड कर लेने के बजाय वह ये जांच करे कि मामला वास्तव में SC/ST एक्ट के तहत आता है या नहीं। सिर्फ़ शिकायतकर्ता के SC/ST होने से FIR की अनिवार्यता नहीं है, जब तक कि जाति के आधार पर अपमान या अत्याचार का स्पष्ट सबूत न हो। यदि अदालत को लगता है कि तुरंत जांच की जरूरत नहीं है, तो वह आवेदन को शिकायत मामले (complaint case) के रूप में ले सकती है और बयान दर्ज कर सकती है। मालूम हो कि इससे पहले भी एक अन्य फैसले में हाईकोर्ट ने कहा था कि किसी को उसके पेशे से बुलाना, जब तक कि अपमान करने का इरादा न हो, SC/ST अधिनियम के तहत अपराध नहीं है।
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