कनाडा में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के संभावित दौरे पर छिपे सियासी विवाद, एनडीपी सांसदों के विरोध और कनाडाई हिंदू समुदाय की प्रतिक्रिया पर विस्तृत अपडेट पढ़ें।
टोरंटो (कनाडा)। कनाडा में अगस्त के अंत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के प्रस्तावित दौरे को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। एक ओर कनाडा में रह रहे बड़ी संख्या में हिंदू समुदाय के लोग उनके स्वागत की तैयारी में हैं। वहीं NDP सांसद जेनी क्वान और हीदर मैकफर्सन ने कनाडा सरकार से भागवत को देश में प्रवेश से रोकने की मांग की है।
इस पत्र ने केवल भारत-कनाडा संबंधों को लेकर बहस नहीं छेड़ी है, बल्कि सांसदों के आरोपों के आधार, कनाडा में हिंदू समुदाय के प्रति समान व्यवहार और RSS को आतंकवादी संगठन घोषित करने की मांग जैसे कई गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं।
सबसे पहले समझें पूरा मामला
- मोहन भागवत के अगस्त 2026 के अंत में टोरंटो पहुंचने की उम्मीद है।
- NDP सांसद जेनी क्वान और हीदर मैकफर्सन ने कनाडा सरकार से उन्हें प्रवेश की अनुमति न देने का आग्रह किया है।
- दोनों सांसदों ने भागवत और RSS को लेकर कई गंभीर आरोप लगाए हैं और संगठन को कनाडा में प्रतिबंधित करने की मांग दोहराई है।
- दूसरी ओर, कनाडा में रह रहे कई हिंदू इस दौरे को लेकर उत्साहित हैं और इसे अपने धार्मिक-सांस्कृतिक नेतृत्व से जुड़ाव के रूप में देख रहे हैं।
टोरंटो में कार्यक्रम, फिर ब्रिटिश कोलंबिया और अल्बर्टा के सांसद क्यों सक्रिय?
इस पूरे विवाद में एक अहम सवाल यह भी है कि जिस कार्यक्रम को लेकर विवाद खड़ा हुआ है, वह ग्रेटर टोरंटो एरिया में प्रस्तावित है, जबकि पत्र लिखने वाले सांसद ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो ब्रिटिश कोलंबिया और अल्बर्टा में हैं।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि हजारों किलोमीटर दूर होने वाले कार्यक्रम में इन सांसदों के हस्तक्षेप की वजह क्या है? क्या यह केवल सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी चिंता है, या इसके पीछे भारत-कनाडा संबंधों और RSS को लेकर NDP की लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक स्थिति भी प्रभाव डाल रही है?
इस हस्तक्षेप को कनाडा के हिंदू समुदाय के एक हिस्से की ओर से पक्षपातपूर्ण रवैये के रूप में भी देखा जा सकता है। हालांकि, इस धारणा को भी प्रमाण और व्यापक संदर्भ के आधार पर ही परखा जाना चाहिए।
NDP सांसदों ने भागवत पर लगाए बेहद गंभीर आरोप
जेनी क्वान और हीदर मैकफर्सन के पत्र में मोहन भागवत को कनाडा में प्रवेश के लिए अयोग्य ठहराने की मांग के पीछे कई गंभीर आरोपों का उल्लेख किया गया है। सांसदों ने कथित तौर पर भागवत पर "नफरत फैलाने वाले भाषणों का इतिहास, धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की वकालत, भारत और कनाडा में आलोचकों को लक्षित कर डराने-धमकाने और आपराधिक संगठनों तथा सूचीबद्ध आतंकवादी संगठनों से संबंध" जैसे आरोप लगाए हैं।
ये सामान्य राजनीतिक आरोप नहीं हैं। इनका स्वरूप बेहद गंभीर है और इसलिए इनके समर्थन में ठोस, सत्यापित और सार्वजनिक रूप से जांचे जा सकने वाले प्रमाण का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता है।
मसलन, क्या सांसद इन आरोपों के समर्थन में भागवत के कथित "हेट स्पीच" के ठोस उदाहरण पेश कर सकते हैं? धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की कथित वकालत का क्या प्रमाण है? भारत या कनाडा में आलोचकों को लक्षित कर धमकाने के कौन से मामले सामने आए हैं? और आपराधिक या सूचीबद्ध आतंकवादी संगठनों के साथ कथित संबंधों को साबित करने वाला प्रमाण क्या है?
इतने गंभीर आरोपों के साथ उतने ही गंभीर साक्ष्य भी अपेक्षित हैं। यदि ये आरोप प्रमाणित नहीं किए जा सकते, तो क्या राजनीतिक प्रतिनिधियों को अपने बयानों की समीक्षा नहीं करनी चाहिए?
'सोशल डिसऑर्डर' और सुरक्षा का दावा भी सवालों के घेरे में
NDP सांसदों ने यह भी तर्क दिया है कि भागवत की कनाडा में मौजूदगी "सामाजिक अव्यवस्था" पैदा कर सकती है और ऐसे कनाडाई नागरिकों के लिए खतरा बन सकती है जो पहले से ही धमकी, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दमन और हिंसा की आशंका का सामना कर रहे हैं।
लेकिन यहां भी मुख्य सवाल यही है कि इस आशंका का आधार क्या है?
क्या कनाडा में RSS या मोहन भागवत की गतिविधियों से जुड़ी ऐसी कोई विशिष्ट घटना सामने आई है, जिसे सार्वजनिक अव्यवस्था या सुरक्षा खतरे के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जा सके? यदि किसी निर्वाचित प्रतिनिधि की ओर से किसी व्यक्ति को सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा बताया जा रहा है, तो उसके पीछे तथ्य और प्रमाण होना जरूरी है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में असाधारण आरोप केवल आशंका या राजनीतिक बयानबाजी के आधार पर तय नहीं किए जाने चाहिए।
हरदीप सिंह निज्जर मामला भी पत्र में उठा
NDP सांसदों ने कनाडाई नागरिक हरदीप सिंह निज्जर की हत्या और भारतीय नेतृत्व से जुड़े आरोपों का भी संदर्भ दिया है। हालांकि, इस संदर्भ में कनाडाई कानून प्रवर्तन एजेंसियों के सार्वजनिक बयानों और राजनीतिक आरोपों के बीच अंतर करना जरूरी है। स्रोत के अनुसार, जुलाई 2026 में CBC के कार्यक्रम Power & Politics को दिए एक इंटरव्यू में RCMP की डिप्टी कमिश्नर लिसा मोरलैंड ने कथित तौर पर कहा था कि उस समय तक भारतीय सरकार को इस ऑपरेशन से जोड़ने वाली कोई बात सामने नहीं आई थी।
इसका अर्थ यह नहीं है कि निज्जर हत्याकांड की जांच की गंभीरता कम हो जाती है। बल्कि यह उस मूल सिद्धांत को रेखांकित करता है कि किसी व्यक्ति, संगठन या सरकार पर गंभीर आरोपों का आकलन प्रमाण और उचित कानूनी प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए।
RSS को 'फासीवादी' संगठन बताने और प्रतिबंध की मांग पर भी बहस
इसके बावजूद NDP सांसदों ने मोहन भागवत को एक "फासीवादी" संगठन के प्रमुख के रूप में चित्रित किया है। उन्होंने RSS को कनाडा में प्रतिबंधित करने और उसे आतंकवादी संगठनों की सूची में शामिल करने की अपनी पार्टी की पुरानी मांग भी दोहराई है। सांसदों ने लिखा कि न्यू डेमोक्रेट्स ने "लंबे समय से कनाडा से RSS को प्रतिबंधित करने, RSS को आतंकवादी संगठनों की सूची में डालने और उससे जुड़े नेटवर्क पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है।"
यहां एक अहम कानूनी प्रश्न सामने आता है- कनाडा के कानून के तहत किसी संगठन को आतंकवादी संगठन घोषित करने की आवश्यक कानूनी कसौटी को RSS किस आधार पर पूरा करता है? किसी संगठन पर आतंकवाद से जुड़े होने का आरोप और उसे कानूनी रूप से आतंकवादी संगठन घोषित करना दो अलग-अलग बातें हैं। RSS की तुलना अल-कायदा या ISIS जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त आतंकवादी संगठनों से करने के लिए भी समान स्तर के आचरण और उसके प्रमाण सामने रखना आवश्यक होगा।
RSS को लेकर कनाडा में दो बिल्कुल अलग धारणाएं
स्रोत के अनुसार, कनाडा में कानूनी कार्यवाही के जरिए RSS को कनाडा में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंसक गतिविधियों के लिए जिम्मेदार संगठन के रूप में स्थापित नहीं किया गया है। RSS के समर्थक इसे मुख्य रूप से सामाजिक सेवा, सामुदायिक गतिविधियों, सांस्कृतिक कार्यों और हिंदू सभ्यता पर आधारित बौद्धिक एवं राजनीतिक विमर्श से जुड़ा संगठन बताते हैं। इसलिए यदि संगठन पर आतंकवाद या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंसा से जुड़े आरोप लगाए जाते हैं, तो उन आरोपों के समर्थन में विश्वसनीय प्रमाण सामने आना जरूरी होगा। राजनीतिक असहमति और कानूनी रूप से स्थापित आपराधिक जिम्मेदारी को एक ही पैमाने पर नहीं रखा जा सकता।
मोदी सरकार के साथ कनाडा के रिश्तों पर भी NDP का निशाना
पत्र के अंतिम हिस्से में NDP सांसदों ने कनाडा की लिबरल सरकार पर भी निशाना साधा है। उनका आरोप है कि सरकार का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के साथ संबंध लगातार नजदीकी की ओर बढ़ रहा है। सांसदों का तर्क है कि इससे कनाडा में रहने वाले कई अल्पसंख्यक समुदायों के बीच यह भावना पैदा हुई है कि सरकार अब उनकी चिंताओं और सुरक्षा को पहले की तरह महत्व नहीं दे रही।
लेकिन इस दावे की भी स्वतंत्र रूप से पड़ताल जरूरी है। क्या कनाडाई सिखों, मुसलमानों या अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के सामने ऐसा प्रमाण रखा गया है कि मोहन भागवत की कनाडा में मौजूदगी वास्तव में उनके लिए सुरक्षा खतरा पैदा करेगी? इसी तरह यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या कनाडा में RSS के समर्थकों या उससे जुड़े लोगों की गतिविधियों को किसी ठोस सुरक्षा खतरे के रूप में स्थापित किया गया है?
कनाडा में कई समुदायों ने झेली है हिंसा और धमकी
कनाडा में अलग-अलग समुदायों के लोगों को हिंसा और डराने-धमकाने की घटनाओं का सामना करना पड़ा है। इनमें यहूदी, ईसाई, हिंदू, सिख और मुस्लिम समुदाय के लोग शामिल हैं। स्रोत में चरमपंथी इस्लामी समूहों और हिंसक खालिस्तानी तत्वों से जुड़े खतरों का भी उल्लेख किया गया है। लेकिन चरमपंथ का जवाब किसी पूरे धार्मिक या सांस्कृतिक समुदाय पर सामूहिक संदेह नहीं हो सकता। किसी हिंदू नेता का स्वागत करने वाले कनाडाई हिंदुओं को इस आधार पर कनाडाई समाज के लिए खतरे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए कि वे किसी विशेष धार्मिक या सांस्कृतिक व्यक्तित्व से जुड़ाव रखते हैं।
'हिंदूफोबिया' की बहस क्यों उभर रही है?
NDP सांसदों के हस्तक्षेप को कनाडा में रहने वाले कई हिंदू हिंदूफोबिया यानी हिंदू संगठनों और नेताओं के प्रति अलग या भेदभावपूर्ण मानदंड अपनाए जाने की प्रवृत्ति के रूप में देख सकते हैं। यह धारणा सही है या नहीं, यह अलग बहस का विषय है। लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह सवाल महत्वपूर्ण है कि क्या अलग-अलग धार्मिक और सांस्कृतिक समुदायों के लिए समान मानदंड लागू किए जा रहे हैं। कनाडा का सामाजिक ताना-बाना हिंदू, सिख, मुस्लिम, यहूदी, ईसाई और गैर-धार्मिक नागरिकों समेत विभिन्न समुदायों से मिलकर बना है। ऐसे में समान सम्मान, सुरक्षा और कानून के तहत समान व्यवहार ही साझा लोकतांत्रिक आधार होना चाहिए।
'वह कनाडा में स्वागत योग्य नहीं'—NDP का कड़ा रुख
NDP सांसदों का अंतिम बयान और भी स्पष्ट था। उन्होंने कहा कि मोहन भागवत की मौजूदगी "कनाडाई लोगों के लिए खतरा होगी", "उनका यहां स्वागत नहीं है" और अब RSS तथा उसके सदस्यों को कनाडा से प्रतिबंधित करने का समय आ गया है। ऐसे व्यापक और निर्णायक दावों की गंभीर जांच जरूरी है। कनाडा की पहचान बहुलतावाद, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता और विभिन्न सांस्कृतिक एवं धार्मिक पृष्ठभूमियों से आए लोगों की सार्वजनिक जीवन में भागीदारी से जुड़ी है।
राजनीतिक असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है। शांतिपूर्ण विरोध भी वैध है और किसी धार्मिक या राजनीतिक नेता की आलोचना करना भी पूरी तरह वैध है। लेकिन यदि किसी विदेशी धार्मिक या सांस्कृतिक नेता को अप्रमाणित आरोपों के आधार पर कनाडा से बाहर रखने की मांग की जाती है, तो इससे उन्हीं लोकतांत्रिक मूल्यों पर सवाल उठ सकते हैं जिनकी रक्षा का दावा किया जाता है।
दस लाख से अधिक कनाडाई हिंदुओं का सवाल
NDP सांसदों की बयानबाजी को कनाडा के 10 लाख से अधिक हिंदुओं के लिए भी संवेदनशील मुद्दा माना जा सकता है। विशेष रूप से ग्रेटर टोरंटो एरिया में बड़ी हिंदू आबादी मौजूद है, जहां भागवत के प्रस्तावित दौरे को लेकर उत्साह की बात सामने आई है। ऐसे बयानों से हिंदू, सिख, मुस्लिम और अन्य समुदायों के बीच मौजूद सामाजिक दूरी और बढ़ने की आशंका भी जताई जा सकती है। कनाडा की बहुसांस्कृतिक व्यवस्था में हर समुदाय की गरिमा, सुरक्षा और कानून के तहत समान अधिकार महत्वपूर्ण हैं।
भागवत के समर्थकों का क्या कहना है?
मोहन भागवत सार्वजनिक मंचों पर मानवता, सामाजिक सद्भाव और विभिन्न समुदायों के बीच संवाद की बात करते रहे हैं। उनके समर्थकों का कहना है कि प्रस्तावित दौरे का मूल संदेश सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक सेवा और मानवीय एकता से जुड़ा है। उनके विचारों से सहमत होना जरूरी नहीं है। लेकिन लोकतांत्रिक समाज में किसी नेता के विचारों का जवाब खुले विमर्श, आलोचना और बहस के जरिए दिया जा सकता है। यदि किसी व्यक्ति या संगठन के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की जा रही है, तो उसके लिए प्रमाण और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का महत्व और बढ़ जाता है।
कुछ संगठनों का विरोध क्या पूरे कनाडा की राय है?
NDP सांसदों ने अपने रुख के समर्थन में कई कनाडाई संगठनों का उल्लेख भी किया है। हालांकि, कुछ संगठनों का राजनीतिक विरोध अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वे कनाडा के सभी नागरिकों या पूरे हिंदू समुदाय की राय का प्रतिनिधित्व करते हैं। किसी भी बहुलतावादी समाज में एक ही मुद्दे पर अलग-अलग समुदायों, संगठनों और नागरिकों के बीच मतभेद होना स्वाभाविक है।
अब आगे क्या?
विवाद और विरोध के बावजूद कनाडा में बड़ी संख्या में हिंदू मोहन भागवत के प्रस्तावित दौरे को लेकर उत्साहित बताए जा रहे हैं। मूल प्रश्न यही है कि क्या किसी धार्मिक या सांस्कृतिक नेता की यात्रा को रोकने के लिए लगाए गए आरोप ठोस प्रमाणों पर आधारित हैं? यदि मोहन भागवत या RSS के खिलाफ विश्वसनीय और गंभीर आरोप हैं, तो उन्हें सार्वजनिक प्रमाणों के साथ सामने लाकर कनाडा की उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत जांचा जाना चाहिए।
लेकिन यदि आरोप प्रमाणित नहीं किए जा सकते, तो राजनीतिक नेताओं को किसी विदेशी धार्मिक एवं सांस्कृतिक व्यक्तित्व के खिलाफ व्यापक आरोप लगाने से पहले सावधानी बरतनी होगी। क्योंकि ऐसी बयानबाजी का असर केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उससे जुड़े पूरे समुदाय के लोग भी प्रभावित हो सकते हैं।
कनाडा के बहुसांस्कृतिक लोकतंत्र के सामने चुनौती यह है कि असहमति के बीच भी संवाद कायम रहे। आरोपों की जगह प्रमाण, विभाजन की जगह संवाद और किसी एक समुदाय को निशाना बनाने के बजाय सभी समुदायों के लिए समान सम्मान- यही उस बहुलतावादी व्यवस्था की बुनियादी कसौटी होनी चाहिए, जिस पर कनाडा की सामाजिक पहचान टिकी है।

(डिस्क्लेमर: ताहिर असलम गोरा "ए स्टोरी ऑफ एन इस्लामोफोब लिविंग इन ट्रूडोज़ खालिस्तान" और "ग्लोबल विलेज इन 2026 एंड बियॉन्ड" पुस्तकों के लेखक हैं। इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके अपने हैं।)
(भाषांतर: Ravi Pandey । इनपुट: ANI)
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