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कैंसर सेल थैरेपी में बड़ी सफलता: बाधा दूर

कैंसर सेल थेरेपी में बड़ी सफलता: वैज्ञानिकों ने दूर की सबसे बड़ी बाधा

वैज्ञानिकों को कैंसर के इलाज से जुड़ी सेल थेरेपी के क्षेत्र में एक बड़ी कामयाबी मिली है। शोधकर्ताओं ने पहली बार स्टेम सेल से हेल्पर टी-सेल्स को भरोसेमंद तरीके से तैयार करने का तरीका खोज लिया है।

कैंसर सेल थेरेपी में बड़ी सफलता वैज्ञानिकों ने दूर की सबसे बड़ी बाधा

Cancer Cell Therapy |

क्यों जरूरी है यह खोज?

वैज्ञानिकों को कैंसर के इलाज से जुड़ी सेल थेरेपी के क्षेत्र में एक बड़ी कामयाबी मिली है। शोधकर्ताओं ने पहली बार स्टेम सेल से हेल्पर टी-सेल्स को भरोसेमंद तरीके से तैयार करने का तरीका खोज लिया है। यह खोज इम्यून-आधारित कैंसर थेरेपी के रास्ते में आने वाली एक बड़ी रुकावट को दूर करती है। हेल्पर टी-सेल्स हमारे इम्यून सिस्टम के “कोऑर्डिनेटर” होते हैं। ये अन्य इम्यून सेल्स को सक्रिय करते हैं, उन्हें सही दिशा देते हैं और शरीर की रक्षा क्षमता को लंबे समय तक मजबूत बनाए रखते हैं। कैंसर से लड़ाई में इनकी भूमिका बेहद अहम मानी जाती है। यह रिसर्च यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया (यूबीसी) के वैज्ञानिकों ने की है। अध्ययन 7 जनवरी को एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल में प्रकाशित हुआ। इस शोध से अब ऐसे “ऑफ-द-शेल्फ” यानी पहले से तैयार सेल थेरेपी विकसित करने की उम्मीद बढ़ गई है, जो सस्ती होंगी, जल्दी उपलब्ध होंगी और ज्यादा लोगों तक पहुंच सकेंगी। अब तक ज्यादातर सेल थेरेपी मरीज की अपनी इम्यून कोशिकाओं से बनाई जाती थीं। इसमें काफी समय लगता है, खर्च ज्यादा होता है और हर मरीज के लिए अलग-अलग प्रक्रिया करनी पड़ती है। इसी वजह से यह इलाज बहुत से लोगों की पहुंच से बाहर रहा है। वैज्ञानिकों का लक्ष्य है कि भविष्य में स्टेम सेल जैसी नवीकरणीय (बार-बार इस्तेमाल की जा सकने वाली) स्रोतों से बड़े पैमाने पर इम्यून सेल्स तैयार किए जाएं, ताकि जरूरत पड़ते ही मरीजों को इलाज मिल सके।

हेल्पर और किलर टी-सेल्स की जोड़ी

कैंसर के इलाज में दो तरह की टी-सेल्स का साथ जरूरी होता है।

  • किलर टी-सेल्स सीधे कैंसर या संक्रमित कोशिकाओं पर हमला करते हैं।
  • हेल्पर टी-सेल्स पूरे इम्यून सिस्टम को निर्देश देते हैं और लड़ाई को लंबे समय तक बनाए रखते हैं।

अब तक स्टेम सेल से किलर टी-सेल्स बनाना तो संभव था, लेकिन हेल्पर टी-सेल्स को लगातार और सही तरीके से बनाना एक बड़ी चुनौती थी।

वैज्ञानिकों ने क्या नया किया?

इस नई स्टडी में वैज्ञानिकों ने स्टेम सेल के विकास को नियंत्रित करने वाले एक खास जैविक सिग्नल “नॉच” पर काम किया। उन्होंने पाया कि यह सिग्नल शुरुआती समय में जरूरी होता है, लेकिन अगर यह ज्यादा देर तक सक्रिय रहे तो हेल्पर टी-सेल्स बनने से रुक जाते हैं। सही समय पर और सही मात्रा में इस सिग्नल को कम करके वैज्ञानिक यह तय करने में सफल रहे कि स्टेम सेल हेल्पर टी-सेल बने या किलर टी-सेल। इतना ही नहीं, लैब में तैयार किए गए हेल्पर टी-सेल्स दिखने में ही नहीं, बल्कि काम करने के तरीके में भी बिल्कुल असली मानव इम्यून सेल्स जैसे पाए गए। वे पूरी तरह परिपक्व थे और अलग-अलग इम्यून भूमिकाओं में ढलने की क्षमता रखते थे।

भविष्य की उम्मीद

शोधकर्ताओं का मानना है कि हेल्पर और किलर टी-सेल्स दोनों को संतुलित तरीके से तैयार करने की यह क्षमता कैंसर, संक्रामक बीमारियों और ऑटोइम्यून रोगों के इलाज को कहीं ज्यादा प्रभावी बना सकती है। यह खोज न सिर्फ कैंसर सेल थेरेपी को नई दिशा देती है, बल्कि भविष्य में सस्ती, सुरक्षित और बड़े पैमाने पर उपलब्ध इम्यून थेरेपी की नींव भी रखती है।

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