तानसेन समारोह का यह 101वां आयोजन है। इस साल सोमवार से 19 दिसंबर तक आयोजित हो रहे समारोह में कुल 10 संगीत सभाएं होंगी
तानसेन समारोह का 101वां आयोजन, 15-19 दिसंबर
तानसेन समारोह का यह 101वां आयोजन है। इस साल सोमवार से 19 दिसंबर तक आयोजित हो रहे समारोह में कुल 10 संगीत सभाएं होंगी, जिसमें देश और दुनिया के ब्रह्मनाद के शीर्षस्थ साधक संगीत सम्राट तानसेन को स्वरांजलि अर्पित करेंगे।
परंपरागत रीति से हुई शुरुआत
हरिकथा, शहनाई वादन, मिलाद एवं चादरपोशी के साथ तानसेन समारोह की पारंपरिक शुरुआत शाम को औपचारिक शुभारंभ के साथ हुई।
देश का प्रतिष्ठित शास्त्रीय संगीत महोत्सव
भारतीय शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठापूर्ण महोत्सव “तानसेन समारोह” की सोमवार सुबह पारंपरिक ढंग से शुरुआत की गई।
तानसेन समाधि स्थल पर धार्मिक-सांगीतिक आयोजन
हजीरा स्थित तानसेन समाधि स्थल पर शहनाई वादन, हरिकथा, मिलाद, चादरपोशी और कव्वाली गायन का आयोजन हुआ।
101वां वर्ष, ऐतिहासिक आयोजन
सुर सम्राट तानसेन की स्मृति में आयोजित होने वाले तानसेन समारोह का इस वर्ष 101वां आयोजन है।
भव्य मंच से हुआ औपचारिक शुभारंभ
तानसेन समारोह का औपचारिक शुभारंभ सोमवार सायंकाल हजीरा स्थित तानसेन समाधि परिसर में ऐतिहासिक चतुर्भुज मंदिर की थीम पर बने भव्य एवं आकर्षक मंच पर हुआ।
शहनाई वादन से गूंजा समाधि परिसर
तानसेन समाधि स्थल पर परंपरागत ढंग से उस्ताद मजीद खाँ एवं साथियों ने रागमय शहनाई वादन प्रस्तुत किया।
हरिकथा में अध्यात्म और संगीत का संगम
इसके बाद ढोलीबुआ महाराज नाथपंथी संत श्री सच्चिदानंद नाथ जी ने संगीतमय आध्यात्मिक प्रवचन दिया, जिसमें ईश्वर और मनुष्य के रिश्तों को उजागर किया गया।
सुर को बताया धर्म का सर्वोच्च रूप
उन्होंने कहा कि हर मनुष्य में ईश्वर विद्यमान है। हम सब ईश्वर की संतान हैं और सभी मतों का संदेश एक ही है—नेकी के मार्ग पर चलना। जो झुक जाता है वही बड़ा होता है। उन्होंने कहा कि सुर ही धर्म है और जो निर्विकार भाव से गाता है वही सच्चा भक्त है।
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