भारत में हीटवेव बढ़ रही है। जलवायु परिवर्तन के कारण लू की घटनाएं और तीव्रता खतरनाक स्तर पर पहुंच गई हैं, जिससे स्वास्थ्य जोखिम बढ़ा है।
नई दिल्ली। भारत में गर्मी अब सिर्फ मौसम नहीं, बल्कि एक गंभीर चेतावनी बन चुकी है। हाल ही में Scientific Reports में प्रकाशित एक रिसर्च के मुताबिक देश में हीटवेव यानी लू की घटनाएं न सिर्फ बढ़ी हैं, बल्कि उनकी तीव्रता और प्रभाव भी पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक हो गया है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन यानी ग्लोबल वार्मिंग को माना जा रहा है।
लू का बढ़ता दायरा, बढ़ता खतरा
पहले जहां देश का लगभग 11.9 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र लू से प्रभावित होता था, अब यह बढ़कर करीब 18.1 लाख वर्ग किलोमीटर तक पहुंच गया है। इसका मतलब है कि अब ज्यादा आबादी इस खतरनाक गर्मी की चपेट में आ रही है।
तापमान में लगातार बढ़ोतरी
1981 से 2020 के बीच भारत का औसत तापमान लगभग 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। यह आंकड़ा छोटा लग सकता है, लेकिन इसके प्रभाव बेहद गंभीर हैं। उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं, जबकि दक्षिण और तटीय क्षेत्रों में भी गर्मी और उमस लगातार बढ़ रही है।
लू के दिनों और अवधि में इज़ाफा
पहले 1981 से 2000 के बीच साल में औसतन 2.5 से 5.5 दिन लू चलती थी, लेकिन 2001 से 2020 के बीच यह बढ़कर 3.5 से 8.5 दिन हो गई। यानी अब लोगों को ज्यादा दिनों तक तेज़ गर्मी झेलनी पड़ रही है।
हीटवेव क्या होती है?
India Meteorological Department के अनुसार, जब किसी क्षेत्र का तापमान सामान्य से 4.5 से 6.4 डिग्री ज्यादा हो जाता है या 45°C के पार पहुंच जाता है, तो उसे हीटवेव कहा जाता है। वहीं, तापमान 47°C से ऊपर या सामान्य से 6.4 डिग्री ज्यादा होने पर इसे ‘भयंकर लू’ माना जाता है।
रात की गर्मी भी बढ़ा रही चिंता
इस रिसर्च में एक और चिंताजनक पहलू सामने आया है—रात का तापमान भी सामान्य से 5 से 8 डिग्री तक ज्यादा दर्ज किया जा रहा है। इससे शरीर को ठंडा होने का समय नहीं मिल पाता, जिससे स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है।
ह्यूमिड हीट का बढ़ता खतरा
अब सिर्फ तापमान ही नहीं, बल्कि हवा में नमी यानी ह्यूमिडिटी भी खतरा बढ़ा रही है। ‘वेट बल्ब टेम्परेचर’ बढ़ने से शरीर की ठंडक बनाए रखने की क्षमता घट जाती है, जिससे हीट स्ट्रोक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
शहरों में बढ़ता ‘हीट आइलैंड’ प्रभाव
शहरी इलाकों में कंक्रीट और सीमेंट के ढांचे गर्मी को सोख लेते हैं, जिससे शहरों का तापमान ग्रामीण इलाकों की तुलना में 3 से 5 डिग्री ज्यादा हो जाता है। इसे ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव कहा जाता है।
वैज्ञानिक संस्थाओं की चेतावनी
India Meteorological Department, ISRO और NASA के आंकड़े भी यही संकेत देते हैं कि भारत में गर्मी का स्तर लगातार बढ़ रहा है और यह आने वाले समय में और गंभीर रूप ले सकता है।
भविष्य में बढ़ सकता है खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार, अगर यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में गर्मी से होने वाली मौतों में वृद्धि हो सकती है। खासकर गरीब और कम संसाधनों वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।
सिर्फ आंकड़े नहीं, एक चेतावनी
ये आंकड़े केवल डेटा नहीं हैं, बल्कि एक साफ संदेश हैं—अगर अभी से ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में यह गर्मी सिर्फ असहज नहीं बल्कि जानलेवा संकट बन सकती है।
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